नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने 2019 का ‘बंजर भूमि एटलस- 2019’ जारी कर दिया है. इसके मुताबिक 2008-09 के मुकाबले 2015-16 के बीच बंजर जमीन में कमी आई है. इस दौरान 1.45 मिलियन हैक्‍टेयर बंजर भूमि (Barren Land) को गैर बंजर भूमि (Non-Wasteland) की कैटेगरी में बदला गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर बंजर भूमि को उपयोग लायक बनाने का लक्ष्य रखा है. इस पहल से करीब 75 लाख लोगों को रोजगार (Employment) मिलेगा.

इस एटलस के मुताबिक वर्ष 2008-09 में यहां 17.21 फीसदी जमीन बंजर थी जो 2015-16 में घटकर 16.96 फीसदी रह गई है. मतलब यह है कि उसमें आप कुछ उगा नहीं सकते. इसकी वजह से न सिर्फ कृषि (Agriculture) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है बल्कि इस क्षेत्र में रोजगार की संभावना भी कम हो रही है. इसलिए मोदी सरकार ने अगले 10 साल में 2.6 करोड़ हेक्टेयर बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने का लक्ष्य रखा है. इससे लगभग 75 लाख लोगों को रोजगार (Employment) मिलने का दावा किया गया है.

केंद्रीय केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं कृषि मंत्री नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने यह एटलस जारी किया. यह एटलस भूमि संसाधन विभाग और नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के सहयोग से बनाया गया है. एटलस के मुताबिक भारत में विश्‍व के कुल क्षेत्रफल का 2.4 प्रतिशत जमीन है जबकि यहां दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है. भारत में प्रति व्‍यक्ति कृषि जमीन की उपलब्‍धता 0.12 हैक्‍टेयर है, जबकि विश्‍व का औसत 0.29 हैक्‍टेयर है.

सितंबर में दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने किया था मंथनबंजर जमीन पूरी दुनिया में खेती के लिए संकट है. इसे लेकर ग्रेटर नोएडा में सितंबर के पहले और दूसरे सप्ताह में एक वैश्विक सम्मेलन हुआ था. इसमें बंजर यानी खराब जमीन को उपजाऊ बनाने पर मंथन किया गया. खेती के जानकारों का कहना है कि इस संकट से निपटने के लिए जैविक खेती (Organic Farming) बड़ा विकल्प है. आर्गेनिक खेती बढ़ेगी तो जमीन बंजर होने से बचेगी.

क्यों बंजर हो रही है जमीन?
कृषि विशेषज्ञ एवं राजीव गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी अरुणाचल के वाइस चांसलर प्रो. साकेत कुशवाहा का कहना है कि केमिकल फर्टिलाइजर के अंधाधुंध इस्तेमाल और कहीं बाढ़ और कहीं पानी की कमी से ऐसे हालात पैदा हो रहे हैं. सरकार बंजर जमीन खत्म करने के लिए जो कदम उठा रही है उसका कुछ वर्षों में बहुत सकारात्मक परिणाम सामने आएगा. देश को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए यूरिया का इस्तेमाल हरित क्रांति (1965-66) के बाद शुरू हुआ. लेकिन कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जिस यूरिया को हम उत्पादन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं वह धीरे-धीरे हमारे खेतों को बंजर बना रही है. इसके खतरे को समझने के लिए भारत ने नाइट्रोजन के आकलन के लिए साल 2004 में सोसायटी फॉर कन्जरवेशन ऑफ नेचर (एससीएन) की स्थापना की गई. इससे जुड़कर करीब सवा सौ वैज्ञानिकों ने इंडियन नाइट्रोजन असेसमेंट नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की. जिसमें इसके दुष्परिणाम बताए गए हैं.

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इसलिए अब सरकार किसानों (Farmers) को जैविक खेती की ओर लौटने की अपील कर रही है. ऐसी खेती करने वालों को आर्थिक मदद भी दे रही है. लेकिन किसान इसके लिए फिलहाल तैयार नहीं दिखते. आम किसानों में इस बात की चिंता है कि अगर वो रासायनिक खाद कम कर देंगे तो क्या अनाज और सब्जियां का उत्पादन पहले जैसा रह पाएगा? किसानों का कहना है कि अगर यूरिया इतनी नुकसानदायक है तो सरकार उसका उत्पादन ही क्यों नहीं बंद कर देती.

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में भूगोल विभाग के प्रमुख रहे प्रो. केएन सिंह कहते हैं जैविक खेती करने में चुनौतियां बहुत हैं. लेकिन हमें अंत में अपनाना इसे ही पड़ेगा, क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशक न सिर्फ हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरा है. हरित क्रांति आधारित खेती में जो गेहूं-चावल की प्रजातियां हैं वो ज्यादा पानी और खाद पर निर्भर हैं. इससे जमीन बंजर होने का खतरा बढ़ रहा है.

भारत में जैविक खेती का दायरा
केंद्रीय कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय करीब 27.70 लाख हेक्टेयर में जैविक खेती हो रही है. इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, यूपी और राजस्थान सबसे आगे हैं. भारत में जैविक खेती की तरफ ध्‍यान 2004-05 में गया, जब जैविक खेती पर राष्‍ट्रीय परियोजना (एनपीओएफ) की शुरूआत की गई. नेशनल सेंटर ऑफ आर्गेनिक फार्मिंग के मुताबिक 2003-04 में भारत में जैविक खेती सिर्फ 76,000 हेक्टेयर में हो रही थी जो 2009-10 में बढ़कर 10,85,648 हेक्टेयर हो गई. सिक्किम ने खुद को जनवरी 2016 में ही 100 फीसदी एग्रीकल्चर स्टेट घोषित कर दिया था. उसने रासायनिक खादों और कीटनाशकों को चरणबद्ध तरीके से हटा दिया.

सरकारी सहायता
आर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने पर सरकार का जोर है. था. इसके लिए परम्परागत कृषि विकास योजना बनाई गई है. (Paramparagat Krishi Vikas Yojana) के तहत आपको प्राकृतिक खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये की सरकारी सहायता मिल सकती है. इसमें से किसानों को जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों और वर्मी कंपोस्ट आदि खरीदने के लिए 31,000 रुपये (61 प्रतिशत) मिलता है.

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