Friday, October 30, 2020
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…तो क्या नए इनकम टैक्स रूल से मिलेगा कम पैसे में ज्यादा मुनाफा बनाने का मौका

नई दिल्ली. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (FM Nirmala Sitharaman) ने बजट भाषण 2020 में नए वै​कल्पिक टैक्स ​सिस्टम (Tax Regime) का ऐलान किया है. इसके बाद से ही लोगों में इस बात को लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है कि उनके लिए कौन सा टैक्स सिस्टम बेहतर है. क्या उन्हें पुराने टैक्स सिस्टम में अधिक टैक्स छूट (Tax Exemption) का लाभ मिलेगा या फिर नया टैक्स सिस्टम (New Tax System) उनके लिए बेहतर साबित होगा.

हालांकि, सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि पर्सनल इनकम वाले लोग हर साल अपनी सहूलियत के आधार पर पुराना और नया टैक्स विकल्प चुन सकते हैं. टैक्स जानकारों का कहना है कि नए टैक्स स्ट्रक्चर के अपने फायदे और नुकसान हैं. ये इस बात पर निर्भर करता है कि किसी व्यक्ति की सालाना आय और इन्वेस्टमेंट क्या है. आज हम इस नए टैक्स स्ट्रक्चर को लेकर जानेंगे कि किस आय वर्ग के लोगों को इससे सबसे अधिक फायदा होता है. इससे निवेशकों के रवैये पर क्या असर पड़ेगा. हम इस बात को भी देखेंगे कि नए और पुराने टैक्स स्ट्रक्चर में क्या अंतर है और इसका क्या असर पड़ेगा. इसके बाद हम जानने की कोशिश करेंगे कि क्या निवेश के विकल्प क्या होंगे.

बिना टैक्स छूट के ​कितना बचेगा टैक्स
मान लेते हैं कि कोई व्यक्ति इनकम टैक्स (Income Tax) दाखिल करते वक्त कोई टैक्स डिडक्शन या एक्जेम्पशन क्लेम (Tax Deduction and Exemption Calim) नहीं करता है. ऐसा करने पर अगर किसी की सैलरी सालाना 7.5 लाख रुपये है तो पुराने टैक्स​ सिस्टम के तहत उन्हें 54,600 रुपये टैक्स के तौर पर देना होगा.वहीं, नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत उनका टैक्स 39 हजार रुपये बनता है. इस प्रकार नए टैक्स स्ट्रक्चर में उन्हें 15,600 रुपये सालाना का फायदा होगा. इसी प्रकार अगर किसी की सैलरी सालाना 10 लाख रुपये है तो उन्हें पुराने टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 1,06,600 रुपये और नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 78,000 रुपये का टैक्स देना होगा. नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत सालाना 10 लाख रुपये की सैलरी वाले लोगों को 28,600 रुपये का फायदा होगा.

इसी हिसाब से सालाना 12.5 लाख रुपये, 15 लाख रुपये और 20 लाख रुपये तक की सैलरी वाले लोग क्रमश: 49,400 रुपये, 62,400 रुपये और 62,400 रुपये की बचत कर सकेंगे. लेकिन, इस बचत के साथ आपको इस बात का ध्यान देना होगा कि किसी भी आय वर्ग के लोग कोई डिडक्शन क्लेम नहीं कर रहे हैं.

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टैक्स छूट का लाभ लेने पर कितना टैक्स देना होगा
अब मान लेते हैं कि कोई व्यक्ति 50 हजार रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन, सेक्शन 80C के तहत 1,50,000 रुपये और सेक्शन 80D के तहत मेडिकल पर 25,000 रुपये का टैक्स छूट क्लेम करता है. ऐसी स्थिति में सालाना 7.5 लाख रुपये की कमाई पर पुराने टैक्स सिस्टम के तहत 18,200 रुपये और नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 39 हजार रुपये टैक्स देगा. यानी उन्हें नए टैक्स स्ट्रक्चर में 20,800 रुपये अधिक टैक्स देना होगा.

सालाना 10 लाख रुपये की कमाई पर पुराने टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 70,200 रुपये और नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 78 हजार रुपये टैक्स देना होगा. यानी नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत उन्हें सालाना 7,800 रुपये अधिक देना होगा.

सालाना 12.5 लाख रुपये की कमाई पर पुराने टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 1,24,800 रुपये और नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 1,30,000 रुपये टैक्स देना होगा. यहां उन्हें 5,200 रुपये अधिक टैक्स देना होगा.

हालांकि, सालाना 15 लाख रुपये और 20 लाख रुपये की कमाई करने वाले लोगों को पुराने टैक्स स्ट्रक्चर के तहत क्रमश: 2,02,000 और 3,58,000 रुपये टैक्स देना होगा. जबकि नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत उन्हें क्रमश: 1,95,000 रुपये और 3,51,000 रुपये टैक्स देना होगा. यानी सालाना 15 लाख और 20 लाख की कमाई करने वाले व्यक्ति को नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत 7,800 रुपये की बचत होगी.

क्या चाहती है सरकार
इन दोनों उदाहरण को देखने के बाद एक बात तो साफ हो जाती है कि अगर कोई टैक्स छूट नहीं क्लेम करता है तो उन्हें नए टैक्स स्ट्रक्चर के तहत बचत हो रही है. खासकर, ये फायदा उन लोगों को सबसे अधिक हो रहा, जो सालाना 10 लाख रुपये की कमाई करते है. टैक्स जानकारों का कहना है कि सरकार ने इस नए टैक्स स्ट्रक्चर के साथ एक बात साफ कर दी है. सरकार चाहती है कि आम लोग टैक्स छूट के चक्कर में न पड़ें, भले ही वो पहले से कम दर पर टैक्स दें.

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किसके लिए बेहतर विकल्प बन सकता है नया टैक्स स्ट्रक्चर
एस्कॉर्ट्स सिक्योरिटीज के MD व CEO विनोद दीक्षित ने नए टैक्स स्ट्रक्चर को लेकर कहा, ‘नए टैक्स स्ट्रक्चर से खास कर उन लोगों को फायदा होगा​ जिनकी सालाना कमाई 10 लाख रुपये तक होगी. पहले अधिक कमाई करने वाले लोग टैक्स बचाने के चक्कर में ​इन्वेस्टमेंट (Investment) करते थे. उनका ​अधिकतर इन्वेस्टमेंट टैक्स छूट का ही लाभ दे पाता था. उन्हें महंगाई को मात देने में भी मदद नहीं मिलती है. अधिक सैलरी वाले लोगों का फोकस बस इतना होता था कि वो कुछ इन्वेस्टमेंट इन्स्ट्रूमेंट्स को अपनाएं, जहां टैक्स छूट का लाभ मिले.’

दीक्षित ने यह भी कहा कि जो लोग पहले टैक्स छूट का लाभ लेते थे, वो शायद ही अपनी हैबिट छोड़ें और नए टैक्स स्ट्रक्चर को अपनाएं. लेकिन नई जेनरेशन के लिए नया टैक्स स्ट्रक्चर बेहतर विकल्प बन सकता है.

बढ़ सकता है जोखिम वाले निवेश विकल्प का दायरा
जानकारों का मनना है कि सरकार के नए टैक्स स्ट्रक्चर से लोगों का निवेश करने का रवैया भी बदलेगा. उनका कम ब्याज और टैक्स छूट के विकल्प की जगह ऐसे निवेश टूल्स पर अधिक फोकस होगा, जहां कम समय में उन्हें अधिक ब्याज मिल सकेगा. जैसे- डेट या इक्विटी इन्वेस्टमेंट. इन इन्वेस्टमेंट टूल्स (Investment Tools) में उनकी लिक्विडिटी भी अधिक होगी. नई जेनरेशन को लाइफस्टाइल और एक्सपीरिएंस पर खर्च करना अधिक भाता है. जानकारों ने बताया कि लोगों को अधिक जोखिम वाले इन्वेस्टमेंट टूल्स पर अधिक भरोसा होगा.

बढ़ेगा लोगों का खर्च
केड़िया कमोडिटी के अजय केड़िया का कहना है, ‘सरकार चाहती है कि जो लोग पहले टैक्स छूट का लाभ लेकर बचत करने पर मजबूर थे. लेकिन, नए टैक्स स्ट्रक्चर के बाद अब वो खर्च करने पर अधिक ध्यान देंगे.’ लोग अब पारंपरिक निवेश से हटकर इक्विटी और डेट मार्केट में विकल्प पर अधिक भरोसा करेंगे. उन्हें टैक्स छूट के साथ किसी गारंटीड रिटर्न पर नहीं बल्कि म्यूचुलअल फंड (Mutual Fund) और इक्विटी मार्केट (Equity Market) पर अधिक भरोसा होगा.

उनके लिए सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (Systematic Investment Plan) बेह​तर विकल्प बन सकता है. गोल्ड और दूसरी प्रॉपर्टी पर ​अधिक निवेश कर सकेंगे. इससे इकोनॉमी को भी फायदा होगा. भारत में अधिकतर लोगों के पास अपना घर है. आम लोग अपने दूसरे घर या प्रापर्टी पर खर्च करेंगे.

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केड़िया ने कहा कि इसका एक कारण यह भी है कि पिछले 10 साल में ये बाजार पहले से अधिक बड़ा हुआ है. शेयर मार्केट (Share Market) में इन्वेस्ट करने के लिए लोगों की रुचि बढ़ी है. इसका पहला कारण तो ये है कि लंबे समय में रिटर्न अच्छा मिल जाता है. दूसरा कारण है कि पिछले कुछ सालों बैंकों में घोटाले के मामले में सामने आने के बाद लोगों का भरोसा बैंकिंग सेक्टर (Banking Sector) पर कमजोर हुआ है.

 

वहीं, इसके उलट म्यूचुअल फंड को लेकर ऐसा कोई मामला नहीं सामने आया है. इसका सबसे बड़ा कारण है कि म्यूचुअल फंड्स को मैनेज करने वाले लोग क्वालिफाइड फंड मैनेजर्स (Mutual Fund Managers) और एनलिस्ट होते हैं. साथ ही, इस क्षेत्र में नियमों का अनुपालन सख्ती से किया है. रेग्युलेशन काफी मजबूती से होता है.

नए टैक्स स्ट्रक्चर अपनाने वालों के लिए यहां बनेंगे कमाई के बड़े मौके
नए टैक्स स्ट्रक्चर का लाभ लेने वाले लोग हाई रिस्क रिवॉर्ड रेशियो वाले विकल्प पर अधिक भरोसा करेंगे. इसके लिए उनके पास शेयर मार्केट, कमोडिटी मार्केट, करेंसी मार्केट जैसे विकल्प मौजूद रहेंगे.

म्यूचुअल फंड: म्यूचुअल फंड कंपनियां निवेशकों से पैसे जुटाती हैं और वो इस पैसे को शेयरों में निवेश करती हैं. जो लोग शेयर बाजार में निवेश के बारे में कम जानते हैं, उनके लिए म्यूचुअल फंड निवेश (Mutual Fund Investment) अच्छा विकल्प माना जाता है. इसके लिए किसी भी म्यूचुअल फंड की वेबसाइट के माध्यम से निवेश कर सकते हैं. इसके अलावा म्यूचुअल फंड एडवाइजर की सेवा भी ले सकते हैं. फिलहाल मार्केट में, इक्विटी म्यूचुअल फंड, डेट म्यूचुअल फंड, हाइब्रिड म्यूचुअल फंड और सॉल्युशन म्यूचुअल फंड का विकल्प उपलब्ध है.

करेंसी मार्केट: जिस तरह स्टॉक मार्केट में शेयरों की ट्रेडिंग होती है, उसी तरह फॉरेक्स मार्केट (Forex Market) या विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में कई देशों की करेंसी की ट्रेडिंग होती है. इसके लिए किसी फॉरेक्स ब्रोकर के साथ ट्रेडिंग अकाउंट खुलवाना पड़ता है. इस मार्केट में एक करेंसी को दूसरी करेंसी से बदला जाता है. इस प्रकार की ट्रेडिंग में सबसे अधिक जरूरी बात एक्सचेंज रेट होता है.

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कमोडिटी मार्केट: किसी कमोडिटी को एक्सचेंज के माध्यम से खरीदने व खरीदने के काम को कमोडिटी ट्रेडिंग (Commodity Trading) कहते हैं. जहां विभिन्न जिंसों का ऑनलाइन कारोबार होता है. इसके माध्‍यम से एग्री प्रोडक्ट्स (जैसे- गेहूं, ऑयल, कपास, सोयाबीन) व नॉन-एग्री प्रोडक्ट्स (बेस मेटल, सोना-चांदी) आदि का कारोबार करते हैं.

 

शेयर मार्केट: शेयर मार्केट में लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की खरीद-बिक्री होती है. इन शेयरों के स्टॉक एक्सचेंज (Stock Exchange) के जरिए खरीदा या बेचा जाता है, जहां कंपनियों अपना लिस्टेड (Listed Companies) होती है. ​अगर किसी शेयर को आपने 10 रुपये में खरीदा और कुछ समय बाद आपको इसका भाव 15 रुपये मिल रहा तो इस प्रकार आपको एक शेयर पर 5 रुपये का लाभ होता है.

कुल मिलाकर देखा जाए जो लोग पुराने टैक्स स्ट्रक्चर पर भरोसा करते हैं, वो पारंपरिक निवेश के जरिए टैक्स छूट का लाभ लेते रहेंगे. वहीं, नए टैक्स स्ट्रक्चर आने के बाद लोग कम दर पर टैक्स देकर अपना अधिक पैसे किसी ऐसे टूल में इन्वेस्ट करेंगे, जिससे उन्हें बेहतर रिटर्न (Return on Investment) मिल सके. इसके लिए उनमें जोखिम उठाने की प्रवृत्ति भी बढ़ेगी. ऐसे लोगों के पास लिक्विडिटी की सुविधा होगी और बाजार में अधिक खर्च भी कर सकेंगे. इस पर जानकारों का कहना है कि नए टैक्स स्ट्रक्चर का लाभ वो लोग उठाएंगे जो कम टैक्स छूट के लालच में फंसकर कम और गारंटीड रिटर्न पर नहीं फोकस करना चाहते हैं.

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