Sunday, November 1, 2020
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देश में कोविड लिस्ट में पुणे टॉप पर पहुंचा, क्यों और कैसे?

लॉकडाउन (Lockdown) खुलने के बाद से बहुत तेज़ी से देश भर में कोरोना वायरस (Coronavirus) के मामले बढ़े हैं और लगातार बढ़ते जा रहे हैं. इन हालात में, मुंबई और चेन्नई (Chennai) जैसे हॉटस्पॉट शहरों को पीछे छोड़कर पुणे Covid-19 महामारी का सबसे बड़ा गढ़ बन गया है. हालांकि पूरा ज़िला प्रशासन मुस्तैदी के साथ महामारी को काबू में करने के लिए जुटा रहा, फिर भी पुणे में हालात बेकाबू होते चले गए. ऐसा क्यों हुआ? कई बातें हैं, जो भूल, गलतियों और लापरवाहियों (Administration Failures) को उजागर करती हैं. दूसरे शहरों को सबक देती हैं और एक डरावनी तस्वीर दिखाती हैं.

सबसे पहले ताज़ा आंकड़े
पुणे में स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है, इसका अंदाज़ा आपको आंकड़ों से लगेगा. भारत में वायरस संक्रमण के कुल मामले 50 लाख से ज़्यादा हैं और महाराष्ट्र में 11 लाख. बुधवार के आंकड़े सामने आने के बाद पुणे में कुल केस 2,35,852 हो चुके हैं. कुछ ही दिनों पहले तक मुंबई वो ज़िला था, जहां सबसे ज़्यादा केस थे, लेकिन बीते बुधवार तक के आंकड़ों के मुताबिक अब यहां करीब 1,80,000 केस हैं. यानी पुणे काफी आगे निकल चुका है.

ये भी पढ़ें :- नेपाल और चीन मिलकर फिर से क्यों नाप रहे हैं एवरेस्ट की हाइट?दूसरी तरफ, देश भर में 82 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं, जिनमें से पुणे में 5366 मौतें हो चुकी हैं. करीब 48 हज़ार एक्टिव केस पुणे ज़िले में हैं और हर दिन नए केसों की संख्या साढ़े चार हज़ार का आंकड़ा पार कर चुकी है. पुणे में इस केस लोड के पीछे कारणों को सिलसिलेवार जानते हैं.

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लॉकडाउन के दौरान पुणे के एक इलाके की तस्वीर.

1. कॉंटैक्ट ट्रैसिंग में लापरवाही

लॉकडाउन की शुरूआत में ऐसा हो रहा था कि कोई भी नया केस मिलने पर उसके करीबी संपर्कों तक प्रशासन पहुंचकर उन्हें क्वारंटाइन करने या टेस्ट करने में दिलचस्पी ले रहा था. लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा. इस मामले में पुणे मिरर की विस्तृत रिपोर्ट कहती है कि कोरोना पॉज़िटिव व्यक्तियों के कई करीबियों ने कहा कि कोई प्रशासनिक प्रतिनिधि उन तक नहीं पहुंचा, न कोई स्क्रीनिंग हुई. एक नहीं कई केस स्टडी के ज़रिए रिपोर्ट में यह दावा किया गया है लेकिन पुणे नगर पालिका यानी पीएमसी का दावा है कि कॉंटैक्ट ट्रैसिंग में कोई कसर नहीं छोड़ी गई.

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कॉंटैक्ट ट्रैसिंग यूनिट की प्रमुख डॉ. वैशाली जाधव के मुताबिक हर नए कोविड मरीज़ के कम से कम एक दर्जन कॉंटैक्ट्स की स्क्रीनिंग की जा रही है. वहीं, संक्रामक रोग विशेषज्ञों ने इस दावे को खोखला बताकर साफ कहा कि इस मोर्चे पर प्रशासन शुरू से नाकाम रहा है और लॉकडाउन खुलने के बाद से पुणे में इसकी पोल खुल चुकी है.

2. टेस्ट रिपोर्ट्स में लेटलतीफी
पुणे में महामारी के इतने भयंकर हो जाने के पीछे बड़ा कारण टेस्ट रिपोर्ट्स देर से आना रहा है. हर संक्रमित व्यक्ति चाहे लक्षणों के साथ हो, या लक्षणों के बगैर, वह संक्रमण फैलाता है और रिपोर्ट देर से आने पर इस खतरे से बचने में ज़िला नाकाम रहा. इस लेटलतीफी का दूसरा नुकसान यह भी हुआ कि संक्रमितों को इलाज देर से मिल सका, जिस कारण यहां मौतों की संख्या में भी इज़ाफा हुआ. तीसरा नुकसान यह हुआ कि रिपोर्ट देर से आने पर समय पर विश्लेषण नहीं हो सके और खतरनाक ज़ोन्स को तय कर वहां ठीक से काबू पाने की व्यवस्थाएं समय से नहीं हो सकीं.

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3. रही सही कसर मौसम ने पूरी की
यह भी एक थ्योरी रही कि पुणे में संक्रमण इतनी तेज़ी से फैलने की एक वजह मौसम रहा. इस थ्योरी को कुछ विशेषज्ञों का समर्थन भी मिला. पहले स्वाइन फ्लू नियंत्रण में काम कर चुके डॉ. प्रदीप आवटे के मुताबिक पुणे में पिछले कुछ महीनों में रहे ठंडे, आर्द्र और नम मौसम ने वायरस के पनपने और फैलने में मदद की. मुंबई की तुलना में पुणे के मौसम को वायरस के लिए ज़्यादा उपयुक्त बताने वाले आवटे ने ये भी कहा कि स्वाइन फ्लू के समय 2009 में भी पुणे में केस लोड सबसे ज़्यादा हो गया था.

इन तमाम कारणों और चिंताओं से ग्रस्त पुणे में कोरोना पर काबू पाने के लिए विशेषज्ञ मान रहे हैं कि प्रशासन के साथ ही अब नागरिकों को भागीदारी करना होगी. तमाम सावधानियों के साथ ही लोगों को अपने लक्षणों को लेकर जागरूक रहना होगा और समय पर खुद टेस्टिंग और आइसोलेशन जैसी बातों का खयाल रखना होगा. दूसरी तरफ, राहत की खबर ये आई है कि ‘मेरा परिवार मेरी ज़िम्मेदारी’ मुहिम के तहत देखा गया कि पुणे के ग्रामीण इलाकों में फिलहाल स्थिति बेकाबू नहीं हुई है.

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