Thursday, October 1, 2020
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बगैर प्रदूषण हवा में तैरेंगी और जमीन पर दौड़ेंगी कारें, चुंबकीय ऊर्जा बनेगी ईंधन । world environment day then car and train run by magnetic energy without pollution | knowledge – News in Hindi



 आज विश्व पर्यावरण दिवस है. हम सबकी चिंता हवा में जहर घोल प्रदूषण को खत्म करने की है. साइंटिस्ट लगातार इस काम में लगे हैं. वो ऐसे सुपर कंडक्टर पर काम कर रहे हैं, जिसके बाद कार और अन्य वाहनों को जीवाश्वम ईंधन यानि पेट्रोल और डीजल की जरूरत ही नहीं होगी. वो चुंबकीय ऊर्जा से फर्राटा भरेंगी.जाने माने वैज्ञानिक, चिंतक और लेखक मिशियो काकू ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों से बात करके एक किताब लिखी है. इसमें उन्होंने तार्किक तौर पर ये तलाशने की कोशिश की है कि हमारी जिंदगी आने वाले सालों में किस तरह बदल जाएगी. इस किताब का नाम है “फिजिक्स ऑफ द फ्यूचर-द इनवेंसंस दैट विल ट्रांसफॉर्म अवर लाइव्स”. इस किताब में उन्होंने बहुत डिटेल के साथ हर दशक के बदलती हुई जिंदगी और उसमें मददगार होते विज्ञान के बारे में लिखा है.इस किताब को प्रकाशित हुए करीब 10 साल हो चुके हैं. बीते 15 सालों में काफी हद तक उनकी किताब हमारे बदलते जीवन को बताने के बारे में खरी उतरी है. इसमें भविष्य की ऊर्जा के बारे में बहुत विस्तार से बात की है.ये जाहिर किया है कि कुछ दशकों में हम ईंधन के प्राकृतिक साधनों की जगह प्रदूषणमुक्त नई ऊर्जा का इस्तेमाल करने लगेंगे. इसमें चुंबकीय ऊर्जा खास भूमिका अदा करेगी. सुपर कंडक्टर ही इस चुंबकीय ऊर्जा को पैदा करेंगे.हजारों मील की यात्रा बगैर ईंधन के होगीउनका मानना है कि वर्ष 2050 तक इलैक्ट्रान आधारित नई तकनीक सामने आएगी. आने वाला दौर चुंबकीय ऊर्जा का रहेगा. हजारों मील की यात्रा बिना किसी ईंधन के होगी. ट्रेनें, कार और वाहन चुंबकीय तरंगों में तैरेंगे. सुपर कंडक्टर टैक्नॉलाजी प्रमुख ऊर्जा तकनीक होगी.  सुपर कंडक्टिंग तारों से कोई एनर्जी क्षय नहीं होगा. इलैक्ट्रान बगैर तारों के गति करेंगे.सुपर कंडक्टर्रस में गजब की चमत्कारिक खासियतें होंगी. उनके साथ एक ही दिक्कत होगी कि इन्हें जीरो डिग्री तापमान तक हमेशा ठंडा रखना होगा, ये काम द्रवित हाइड्रोजन के जरिए होगा, जो काफी महंगा हो सकती है.सेरेमिक से बन सकते हैं सुपर कंडक्टर्सवैज्ञानिक पिछले कुछ सालों से सुपर कंडक्टर्स की ऐसी नई श्रेणी का पता लगाने में लगे हैं, जो ज्यादा सुविधाजनक और सस्ती हो, जिन्हें निचले तापमान तक ठंडा करने की जरूरत नहीं होगी. हाल की रिसर्च बताती हैं कि सेरेमिक को भविष्य में सुपर कंडक्टर्स के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.सुपर कंडक्टर्रस आने वाले समय में सबकुछ बदल देंगे. कोई प्रदूषण नहीं होगा. न ही ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या और आगे बढ़ेगी. एक जानी-मानी कार कंपनी ने अपने फ्यूचर के कार मॉडल्स इस तरह होने का अनुमान लगाया हैमैंगलेव ट्रेनें इसी तकनीक की देन हैंजर्मनी, जापान और चीन इस तकनीक में आगे हैं. मैंगलेव ट्रेनें चुबंकीय तरंगों पर तैरते हुए तेज रफ्तार में दूरी तय करती हैं. उनमें ये चुंबकीय तरंगें सुपर कंडक्टर्स के जरिए पैदा की जाती है. शुरुआत में मैंगलेव ट्रेनों की गति धीमी थी लेकिन अब उनकी रफ्तार इतनी ज्यादा हो चुकी है कि वो स्पीड का वर्ल्ड रेकार्ड भी तोड़ रही हैं. इनकी अधिकतम गति 400 मील प्रति घंटा तक पहुंच चुकी है. इनसे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होगा. साइंटिस्ट का मानना है कि अगले कुछ दशकों में हम प्राकृतिक ईंधन का इस्तेमाल बिल्कुल बंद कर देंगे और तब मैग्नेटिक वेब्स हमारी मुख्य ऊर्जा के रूप में काम करेंगी, जिसमें कोई प्रदूषण नहीं होगाखत्म हो जाएंगे ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधनकिताब कहती है, वर्ष 2100 तक पृथ्वी पर प्राकृतिक ऊर्जा के स्रोत खत्म हो चुके होंगे. पेट्रोल, पेट्रोलियम पदार्थ, गैस के स्रोत पूरी तरह से खंगाले जा चुके होंगे. सौर ऊर्जा का महत्व बहुत बढ़ जायेगा. चुंबकीय लहरें एक खास ऊर्जा के तौर पर काम करेंगी. फिलहाल हम दुनिया में 14-15 ट्रिलियन वॉट पॉवर का इस्तेमाल करते हैं. इसके लिए किस ऊर्जा का कितना इस्तेमाल करते हैं, वो इस तरह से है-आयल                                33 फीसदीकोयला                               25 फीसदीगैस                                    20 फीसदीनाभिकीय                          08 फीसदी बॉयोमॉस                           15 फीसदी सोलर                                05 फीसदी (ये आंकड़ें वर्ष 2010 के आसपास के हैं, जिसका उल्लेख साइंटिस्ट मिशियो काकू ने किताब में किया है. हालांकि इसमें बहुत ज्यादा बदलाव अब भी नहीं आया है, लेकिन छिटपुट तौर पर कुछ चेंज नजर आने लगे हैं. जो धीरे धीरे निःसंदेह बढ़ रहे हैं)  आज से कोई 90 साल पहले अमेरिका में शैल ऑयल पेट्रोलियम में काम करने वाले इंजीनियर किंग हबर्ट पहले इंसान थे, जिन्होंने आगाह किया था कि जिस तरह से हम ऊर्जा के प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुरता से दोहन कर रहे हैं, उसके चलते अगले 150 सालों में ऊर्जा के सभी प्राकृतिक संसाधन खत्म हो चुके होंगे.उस समय उनकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया. हालांकि तब उन्होंने अपनी पूरी बात को आंकड़ों के आधार पर साबित भी किया था. वाकई कितना मुश्किल और साहसिक रहा होगा 1933 में ये दावा करना कि पृथ्वी एक दिन कोयला, पेट्रोल, गैस आदि दूसरे ऊर्जा स्रोतों से खाली हो जाएगी. अंतरिक्ष में तैरेंगे बिजलीघर, रेडिएशन से बनेगी बिजली चूंकि धरती पर मौजूद वो प्राकृतिक संसाधन खत्म हो चुके होंगे, जिनसे अभी ऊर्जा उत्पादन करने का काम करते हैं लिहाजा इसके लिए हमें सौर ऊर्जा और अंतरिक्ष से मिलने वाली ऊर्जा पर भी निर्भर रहना होगा.तब अंतरिक्ष में घूमते सैटेलाइट बनेंगे बिजलीघर तब अंतरिक्ष में घूमते हुए तब कृत्रिम उपग्रह बिजली घर का भी काम करेंगे. बड़ी संख्या में सेटेलाइट को सूर्य के विकिरण को सोखकर उन्हें बिजली में बदलने के लिए भेजा जायेगा. हर सैटेलाइट पांच से दस गीगावाट पावर का उत्पादन करने में सक्षम होगी, जो कोल आधारित परंपरागत प्लांट से ज्यादा होगा, ये बिजली सस्ती होगी. भविष्य में बिजली का जेनरेशऩ करने वाले पॉवर हाउस भी धरती की बजाए स्पेस में शिफ्ट होंगे और उनसे हमें क्लीन एनर्जी मिलेगीइन सैटेलाइट का आकार मौजूदा सैटेलाइट की तुलना में खासा बड़ा होगा. इन्हें अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने करने के लिए या तो कई राकेटों की जरूरत होगी या फिर इनके टुकड़े अंतरिक्ष में ले  जाकर उन्हें वहां जोडऩे का काम किया जायेगा. अमेरिका इस योजना पर काम कर रहा है.जापान भी कर रहा स्पेस पॉवर स्टेशन पर काम जापान भी स्पेस में पावर सेटेलाइट स्टेशन की संभावना देख रहा है. मित्सुबिसी इलैक्ट्रिक और कुछ दूसरी कंपनियां इस दिशा में काम कर रही हैं. जापान का अंतरिक्ष में तैनात होने वाले ये बिजलीघर डेढ मील में फैला होगा. दावा है कि ये एक बिलियन वाट पावर का उत्पादन करेगा. एक बात जो सबसे अहम होगी वो ये होगी नैनो टैक्नॉलाजी, यानि हम तकनीक के माइक्रो स्तर तक पहुंच सकेंगे.ये भी पढ़ें



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