महाराष्ट्र (Maharashtra) में बीजेपी-शिवसेना (BJP Shivsena) के बीच तकरार जारी है. दोनों पार्टियां सरकार बनाने के अपने-अपने फॉर्मूले पर अड़ी हैं. शिवसेना सीएम से कम पद पर मानने को तैयार नहीं है और बीजेपी किसी भी कीमत पर सीएम की कुर्सी देने को तैयार नहीं है. इस स्थिति में सरकार बने भी तो कैसे?

महाराष्ट्र चुनाव नतीजों में बीजेपी को 105 सीटें हासिल हैं. शिवसेना को 56 सीटों पर जीत मिली है. पिछली बार की तुलना में दोनों पार्टियों की सीटें कम हुई है. बाला साहेब ठाकरे के वक्त ये फॉर्मूला था कि जो पार्टी ज्यादा सीटें लेकर आएंगी, मुख्यमंत्री की कुर्सी उसे मिलेगी. उस हिसाब से बीजेपी को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलनी चाहिए. लेकिन शिवसेना इस बात पर राजी नहीं है.

शिवसेना का कहना है कि चुनाव पूर्व ही दोनों पार्टियों के बीच 50-50 फॉर्मूले पर सहमति बन गई थी. इस फॉर्मूले के तहत बीजेपी-शिवसेना को बारी-बारी ढाई-ढाई साल के लिए सीएम का पद मिलना था, लेकिन अब बीजेपी अपने वादे से मुकर रही है.

ये कोई पहला मौका नहीं है कि बीजेपी-शिवसेना गठबंधन में रहते हुए भी एकदूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. बीजेपी-शिवसेना के संबंधों का इतिहास बताता है कि गठबंधन में रहते हुए भी दोनों एकदूसरे से लड़ते रहे हैं.30 साल पुराने रिश्ते का इतिहास

शिवसेना का गठन 1960 में बाला साहेब ठाकरे ने किया था. शुरुआती वर्षों में शिवसेना ने कांग्रेस सरकार का समर्थन तक किया था. 1989 के लोकसभा चुनाव के पहले पहली बार हिंदुत्व की छाया तले बीजेपी और शिवसेना के बीच गठबंधन हुआ था. इस गठबंधन में प्रमोद महाजन ने बड़ी भूमिका निभाई थी. उनके शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे से अच्छे संबंध थे. बीजेपी का महाराष्ट्र में अस्तित्व नहीं था. बीजेपी एक रिजनल फोर्स के सहारे अपनी मौजूदगी दर्ज करवाना चाह रही थी.

bjp shiv sena alliance in maharashtra difficult relationship history from bal thackeray to udhav

बाल ठाकरे ने 1960 में शिवसेना का गठन किया था

लोकसभा चुनाव में बीजेपी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ी और शिवसेना को भरोसा दिया कि विधानसभा चुनाव में उसे बड़ा रोल दिया जाएगा. 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना 183 सीटों पर लड़ी और 52 पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी 104 सीटों पर लड़कर 42 सीटों पर जीत हासिल की. उस वक्त शिवसेना के मनोहर जोशी विपक्ष के नेता बने.
2014 के पहले तक महाराष्ट्र में बड़े रोल में रही है शिवसेना

1990 के फॉर्मूले पर ही 1995 में बीजेपी-शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा. 1992 के बाबरी मस्जिद विध्वंस और 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट के बाद सांप्रदायिकता चरम पर थी. शिवसेना और बीजेपी दोनों को इस चुनाव में फायदा मिला. शिवसेना ने 73 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी 65 सीटें झटकने में कामयाब रही.

उस वक्त शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे ने फॉर्मूला दिया था कि जिस पार्टी के पास ज्यादा सीटें होंगी, मुख्यमंत्री उसका होगा. इसी आधार पर मनोहर जोशी को सीएम की कुर्सी मिली और बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे को डिप्टी सीएम की.

सत्ता हासिल करने के बाद पॉलिसी को लेकर बीजेपी-शिवसेना के बीच झगड़े होते रहे. 1999 का चुनाव भी दोनों ने साथ मिलकर लड़ा. उस वक्त भी शिवसेना बड़े रोल में रही. लेकिन 99 के चुनाव में दोनों पार्टियां ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के चक्कर में एकदूसरे से लड़ती रहीं. ज्यादा सीटें हासिल करने वाली पार्टी को ही सीएम की कुर्सी मिलती और दोनों ही पार्टियां इस दिशा में जोर लगा रही थी.

1999 में बीजेपी-शिवसेना का झगड़ा

1999 के चुनाव में शिवसेना को 69 और बीजेपी को 56 सीटों पर जीत हासिल हुई. दोनों को मिलाकर 125 सीटों का आंकड़ा बहुमत से दूर था. शिवसेना को लग रहा था कि बहुमत के लिए बाकी बची सीटों का जुगाड़ हो जाएगा. लेकिन बीजेपी ने इस ओर ज्यादा रूचि नहीं दिखाई.

कहा जाता है कि उस वक्त गोपीनाथ मुंडे मुख्यमंत्री का पद चाह रहे थे. बीजेपी-शिवसेना के बीच 23 दिनों तक बातचीत चलती रही लेकिन कोई रास्ता निकलकर नहीं आया. आखिर में एनसीपी और कांग्रेस के बीच समझौता हुआ और विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के सीएम बने.

बीजेपी ने शिवसेना के साथ गठबंधन जरूर किया था. लेकिन प्रमोद महाजन का सपना था कि महाराष्ट्र में बीजेपी की शत प्रतिशत भूमिका हो. इसलिए बीजेपी ने अपनी विस्तारवादी नीति जारी रखी थी. इसमें शिवसेना आड़े आती रही और दोनों के बीच झगड़े होते रहे. शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे अक्सर कहा करते थे कि कमलाबाई (बीजेपी) महाराष्ट्र में सिर्फ शिवसेना की बदौलत फल फूल रही है.

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2014 के चुनाव से पहले टूटा था बीजेपी-शिवसेना गठबंधन

2014 में बदल गए बीजेपी-शिवसेना के रिश्ते

2014 के चुनाव से पहले तक शिवसेना, बीजेपी पर भारी पड़ती आई थी. 2004 के चुनाव में शिवसेना ने 62 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि बीजेपी को 54 सीटों पर जीत मिली. 2009 में दोनों पार्टियों की सीटें कम हुईं लेकिन बीजेपी को पहली बार शिवसेना से ज्यादा सीटें हासिल हुईं. जबकि शिवसेना (169 सीट) ने बीजेपी (119 सीट) से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.

2014 के चुनाव आते-आते महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थिति बदल चुकी थी. राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की मजबूत जोड़ी सामने आ चुकी थी. मोदी लहर में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की मजबूत सरकार बनी. ताकतवर बीजेपी के सामने शिवसेना महाराष्ट्र में अपने को कम समझने पर राजी नहीं थी.

2014 के चुनाव में 1989 के बाद पहली बार दोनों पार्टियों ने अपने रास्ते अलग-अलग कर लिए. दोनों के बीच का 25 साल पुराना रिश्ता टूट गया. सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी शिवसेना को बीजेपी से आधी सीटें मिलीं. बीजेपी ने 122 सीटों पर जीत हासिल की और शिवसेना ने 63 सीटों पर. हालांकि बाद में शिवसेना बीजेपी की देवेंद्र फडणवीस सरकार में शामिल हो गई.

लेकिन सरकार में शामिल होकर भी शिवसेना विपक्ष की तरह सवाल करती रही. सरकार पर उसके हमले जारी रहे. महाराष्ट्र में शिवसेना का बीजेपी के साथ गठबंधन में बड़े भाई के रोल का वक्त खत्म हो चुका है लेकिन शिवसेना ये मानने को तैयार नहीं है.

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