Tuesday, September 29, 2020
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Ambubachi Mela Kamakhya Temple In Guwahati – अम्बुबाचि का महापर्व, जानिए क्यों मनाया जाता है महादेवी का यह महाउत्सव



Kamakhya Shakti Peeth: यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों की अपेक्षा थोड़ा भिन्न है क्योंकि यह स्थल तंत्र साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्द है।

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शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर देवी सती के विभिन्न अंग जहां-जहां गिरे वहां एक-एक शक्ति एवं एक-एक भैरव विराजमान हो गए। भारतवर्ष की पुण्यभूमि में विभिन्न भागों में ये शक्तिपीठ स्थित हैं जिनके दर्शन,पूजन से विविध मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। ऐसा ही एक शक्तिपीठ है जो महाशक्तिपीठ कहलाता है कामाख्या देवी का मंदिर। यह मंदिर असम राज्य के गुवाहाटी में एक पहाड़ी पर बना है। यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों की अपेक्षा थोड़ा भिन्न है क्योंकि यह स्थल तंत्र साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्द है। कामाख्या में अम्बुबाचि पर्व के अलावा दो उत्सव और मनाए जाते हैं जिनमें से एक है ‘देवध्वनि’ जिसे ‘देऊधाबी’ कहते हैं,इसमें बाध्ययंत्रों के साथ नृत्य किया जाता है।
पौष माह के कृष्ण पक्ष में पुष्य नक्षत्र में पुष्याभिषेक उत्सव मनाया जाता है जिसमें कामेश्वर की चल मूर्ति को कामेश्वर मंदिर में प्रतिष्ठित  किया जाता है। दूसरे दिन भगवती के पंचरत्न मंदिर में दोनों मूर्तियों का हर-गौरी विवाह महोत्सव मनाया जाता है। महाकुंभ कहे जाने वाले इस मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है। यहां सैंकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं।
इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर माता सती का योनि भाग गिरा था इसलिए यहां देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है जो कि शिला के रूप में विराजमान है। यहां नीलप्रस्तरमय योनि माता कामाख्या साक्षात निवास करती हैं। जो मनुष्य इस शिला का पूजन, दर्शन, स्पर्श करते हैं वे देवी कृपा तथा मोक्ष के साथ मां भगवती का सानिध्य प्राप्त करते हैं। इस शक्तिपीठ में देवी मां 64 योगनियों और 10 महाविद्याओं के साथ विराजित है। कलिका पुराण के अनुसार इसी स्थान पर कामदेव शिव के त्रिनेत्र से भस्म हुए तथा अपने पूर्व रूप की प्राप्ति का वरदान पाया था। यहां कामनारुपी फल की प्राप्ति होती है।
हर साल जून के महीने में यह मेला उस वक्त लगता है जब देवी कामाख्या रजस्वला रहती हैं। अम्बुबाचि योग पर्व के दौरान माँ भगवती के गर्भ गृह के कपाट स्वतः ही बंद हो जाते हैं और उनके दर्शन भी निषेध हो जाते हैं। तीन दिनों के उपरान्त माँ भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में देवी को स्नान करवाकर श्रृंगार के उपरान्त ही मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। यात्री पहले दिन कामेश्वरी देवी और कामेश्वर शिव के दर्शन करते हैं और तब महामुद्रा के दर्शन करते हैं। देवी का योनिमुद्रापीठ दस सीढ़ी नीचे एक गुफा में स्थित है जहाँ हमेशा अखंड दीपक जलता रहता है। यहां आने-जाने का मार्ग अलग बना हुआ है।
 
यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपडा दिया जाता है जिसे अम्बुबाचि वस्त्र कहते हैं। कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह में स्थित महामुद्रा के आस-पास सफेद वस्त्र बिछा दिए जाते हैं, तीन दिन बाद जब मंदिर के पट खोले जाते हैं तब यह वस्त्र माता के रज से रक्तवर्णं हो जाते है। बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। कहते हैं इस वस्त्र को धारण करके उपासना करने से भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है, मान्यता के अनुसार इन दिनों में नदी में स्नान नहीं करना चाहिए।
कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है,उमानंद भैरव  ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में टापू पर स्थित है। मान्यता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदा शिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि जाग्रत होने पर शिव ने अपने तीसरे नेत्र से उन्हें भस्म कर दिया था।भगवती के महातीर्थ नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुनः जीवनदान मिला था। इसलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।

शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर देवी सती के विभिन्न अंग जहां-जहां गिरे वहां एक-एक शक्ति एवं एक-एक भैरव विराजमान हो गए। भारतवर्ष की पुण्यभूमि में विभिन्न भागों में ये शक्तिपीठ स्थित हैं जिनके दर्शन,पूजन से विविध मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। ऐसा ही एक शक्तिपीठ है जो महाशक्तिपीठ कहलाता है कामाख्या देवी का मंदिर। यह मंदिर असम राज्य के गुवाहाटी में एक पहाड़ी पर बना है। यह मंदिर अन्य शक्तिपीठों की अपेक्षा थोड़ा भिन्न है क्योंकि यह स्थल तंत्र साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्द है। कामाख्या में अम्बुबाचि पर्व के अलावा दो उत्सव और मनाए जाते हैं जिनमें से एक है ‘देवध्वनि’ जिसे ‘देऊधाबी’ कहते हैं,इसमें बाध्ययंत्रों के साथ नृत्य किया जाता है।

पौष माह के कृष्ण पक्ष में पुष्य नक्षत्र में पुष्याभिषेक उत्सव मनाया जाता है जिसमें कामेश्वर की चल मूर्ति को कामेश्वर मंदिर में प्रतिष्ठित  किया जाता है। दूसरे दिन भगवती के पंचरत्न मंदिर में दोनों मूर्तियों का हर-गौरी विवाह महोत्सव मनाया जाता है। महाकुंभ कहे जाने वाले इस मेले के दौरान तांत्रिक शक्तियों को काफी महत्व दिया जाता है। यहां सैंकड़ों तांत्रिक अपने एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं।

देवी सती का योनि भाग गिरा था यहां

इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, यहां पर माता सती का योनि भाग गिरा था इसलिए यहां देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है जो कि शिला के रूप में विराजमान है। यहां नीलप्रस्तरमय योनि माता कामाख्या साक्षात निवास करती हैं। जो मनुष्य इस शिला का पूजन, दर्शन, स्पर्श करते हैं वे देवी कृपा तथा मोक्ष के साथ मां भगवती का सानिध्य प्राप्त करते हैं। इस शक्तिपीठ में देवी मां 64 योगनियों और 10 महाविद्याओं के साथ विराजित है। कलिका पुराण के अनुसार इसी स्थान पर कामदेव शिव के त्रिनेत्र से भस्म हुए तथा अपने पूर्व रूप की प्राप्ति का वरदान पाया था। यहां कामनारुपी फल की प्राप्ति होती है।

क्यों मनाया जाता है अम्बुबाचि पर्व

हर साल जून के महीने में यह मेला उस वक्त लगता है जब देवी कामाख्या रजस्वला रहती हैं। अम्बुबाचि योग पर्व के दौरान माँ भगवती के गर्भ गृह के कपाट स्वतः ही बंद हो जाते हैं और उनके दर्शन भी निषेध हो जाते हैं। तीन दिनों के उपरान्त माँ भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है। चौथे दिन ब्रह्म मुहूर्त में देवी को स्नान करवाकर श्रृंगार के उपरान्त ही मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। यात्री पहले दिन कामेश्वरी देवी और कामेश्वर शिव के दर्शन करते हैं और तब महामुद्रा के दर्शन करते हैं। देवी का योनिमुद्रापीठ दस सीढ़ी नीचे एक गुफा में स्थित है जहाँ हमेशा अखंड दीपक जलता रहता है। यहां आने-जाने का मार्ग अलग बना हुआ है। 

क्या है अम्बुबाचि वस्त्र

यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपडा दिया जाता है जिसे अम्बुबाचि वस्त्र कहते हैं। कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने से पूर्व गर्भगृह में स्थित महामुद्रा के आस-पास सफेद वस्त्र बिछा दिए जाते हैं, तीन दिन बाद जब मंदिर के पट खोले जाते हैं तब यह वस्त्र माता के रज से रक्तवर्णं हो जाते है। बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। कहते हैं इस वस्त्र को धारण करके उपासना करने से भक्त की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का पानी तीन दिन के लिए लाल हो जाता है, मान्यता के अनुसार इन दिनों में नदी में स्नान नहीं करना चाहिए।

भैरव दर्शन के बिना यात्रा है अधूरी

कामाख्या मंदिर से कुछ दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर है,उमानंद भैरव  ही इस शक्तिपीठ के भैरव हैं। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के बीच में टापू पर स्थित है। मान्यता है कि इनके दर्शन के बिना कामाख्या देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदा शिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि जाग्रत होने पर शिव ने अपने तीसरे नेत्र से उन्हें भस्म कर दिया था।भगवती के महातीर्थ नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुनः जीवनदान मिला था। इसलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।



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