ANALYSIS: रूठे रूठे से क्यों उद्धव सरकार नजर आते हैं...

बीजेपी से सालों की दोस्ती भी कुर्बान करने को तैयार क्यों है शिवसेना

बीजेपी से सालों की दोस्ती भी कुर्बान करने को तैयार क्यों है शिवसेना. जानिए असल वजह

  • News18Hindi
  • Last Updated:
    November 6, 2019, 1:00 PM IST

नई दिल्ली. 24 तारीख को महाराष्ट्र के नतीजे आने के बाद तस्वीर लगभग साफ हो चुकी थी. बीजेपी-शिवसेना महायुति (BJP Shiv Sena alliance) को बहुमत (Majority) मिल चुका था. मंच तैयार था और फडनवीस को सीएम पद (CM) की शपथ की औपचारिकता भर पूरी करनी थी, पर जरा रुकिए.. ये सिर्फ एक तय स्क्रिप्ट भर थी. हकीकत में ऐसा हुआ नहीं. परिणाम आने के बाद से लगातार शिवसेना (Shiv sena) और बीजेपी (BJP) एक दूसरे से आंखें तरेर रहे हैं. महाराष्ट्र (Maharashtra) का राजनीतिक मंच धीरे-धीरे टी ट्वंटी (T20) का हंगामेदार मैदान बन गया. शिवसेना के संजय राउत (Sanjay Raut) बीजेपी के हर राजनीतिक बाउंसर का जवाब सिक्सर मार कर दे रहे हैं. यानी कोई नरमी नहीं, आखिर बात कहां बिगड़ी, जो शिवसेना इस बार बीजेपी से दशकों पुरानी दोस्ती को तिलांजलि देने को तत्पर नजर आ रही है.

भूमिकाएं कब बदलीं
इसे समझने के लिए हमें नब्बे के दौर में जाना होगा जब महाराष्ट्र में बड़ा भाई शिवसेना हुआ करती थी और बीजेपी छोटा भाई हुआ करती थी, लेकिन समय बदलने के साथ ही दोनों की भूमिकाएं भी बदल गईं. 2014 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी शिवसेना के बीच कोई गठबंधन नहीं हो सका. लेकिन बीजेपी अपने दम पर बहुमत तो नहीं लेकिन 122 जैसी अच्छी खासी संख्या लाने में कामयाब ज़रूर हो गई. शिवसेना का दबाव काम नहीं आया और बीजेपी ने सरकार बना ली. ये बात और है कि बीजेपी के साथ शिवसेना बाद में सरकार में शामिल हो गई. शिवसेना को बीजेपी की बदलती स्थिति कभी नहीं भाई. यही कारण है कि शिवसेना बीते 5 साल बीजेपी के साथ सरकार में तो रही है लेकिन बीजेपी को नीचा दिखने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर चाहे सामना के जरिए सरकार की नीतियों पर तीखे व्यंग्य बाण छोड़ना हो या फिर उद्धव का अयोध्या पहुंच जाना.

News - बीजेपी शिवसेना की इस दोस्ती ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं

बीजेपी शिवसेना की इस दोस्ती ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं

शिवसेना का सिकुड़ना
हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी से अटूट गठबंधन की बात करने वाली शिवसेना की तकलीफ दरअसल महाराष्ट्र में उसकी राजनीतिक जमीन लगातार सिकुड़ते जाना है. शिवसेना को अंदरखाने यह लगता है कि अगर वह बीजेपी के लिए ज्यादा जमीन इसी तरह छोड़ती रहेगी को उसका अस्तिव ही कहीं खतरे में न पड़ जाए. बीजेपी और शिवसेना का वोटबैंक भी लगभग एक जैसा है. शिवसेना वर्तमान में जहां मुंबई के आसपास ज्यादा प्रभावी है और मराठा वोटबैंक पर ज्यादा भरोसा करती है. वहीं बीजेपी ने पूरे महाराष्ट्र में अपनी पकड़ बना ली है जो न सिर्फ शिवसेना बल्कि एनसीपी और कांग्रेस के लिए भी तकलीफदेह है.

यूं ही बेचैन नहीं है शिवसेना

बीजेपी से पार्टी की ‘दोस्ती’ के पिछले कुछ साल ये साफ कर देते हैं कि शिवसेना यूं ही बेचैन नहीं है. 1995 में शिवसेना ने बीजेपी से ज्यादा सीटें लाकर अपना सीएम बनाया था, लेकिन 2014 तक आते आते शिवसेना अपना कोई खास विस्तार नहीं कर सकी. जबकि बीजेपी पूरे महाराष्ट्र में अपना विस्तार करने में कामयाब रही. उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ गया जबकि शिवसेना का वोट प्रतिशत अधिकतर चुनावों में 20 फीसदी या उससे नीचे रहा साथ ही वह मुंबई के आसपास तक सिकुड़कर रह गई. शिवसेना दरअसल सीएम पद झटककर अपने कैडर और वोटबैंक में एक मजबूत संदेश भेजना चाहती है इसलिए करो या मरो की मुद्रा में है.

ये भी पढ़ें –
महाराष्ट्र का ‘महाभारत’: 60 घंटे में नहीं बनी सरकार तो गहराएगा राजनीतिक संकट

राजनीतिक संकट की ओर बढ़ते महाराष्ट्र में क्या ये है बीजेपी की चुप्पी का राज़?

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए Mumbai से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.


First published: November 6, 2019, 12:59 PM IST





Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here