• सरकार के लिए आगे आरबीआई से पैसा लेना आसान नहीं होगा, कंटिन्जेंसी फंड के अपने न्यूनतम स्तर पर होने से रिजर्व बैंक के पास विकल्प नहीं
  • रिजर्व बैंक के आपात फंड में अब तक थे 2.3 लाख करोड़ रुपए, इसी फंड में से सरकार को दिए जाएंगे 52,637 करोड़ रुपए

Dainik Bhaskar

Sep 01, 2019, 09:34 AM IST

भास्कर नेटवर्क. रिजर्व बैंक ने 26 अगस्त को एक अहम फैसला लिया। 84 साल के इतिहास में पहली बार 1.76 लाख करोड़ रुपए का सरप्लस फंड केन्द्र सरकार को ट्रांसफर करने का। माना जा रहा है कि इससे सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी जा सकेगी। यह इसलिए भी अहम है, क्योंकि हाल ही में आए जीडीपी के आंकड़ों ने देश को निराश किया है।

 

अप्रैल से जून की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट छह साल के न्यूनतम स्तर महज 5 फीसदी पर रह गई है। जबकि पिछली तिमाही में यह 5.8% थी। सरकार लगातार बैंक रिफॉर्म्स में जुटी हुई है। बैंकों के मर्जर से लेकर विमल जालान कमेटी की सिफारिशों को स्वीकार करना इन्हीं उपायों का हिस्सा है।


एक बात और जान लें- आरबीआई से सरकार को यह पैसा आसानी से नहीं मिला। इसे लेकर मतभेद रह चुके हैं। पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल और उनके डिप्टी विरल आचार्य अपने सरप्लस को सरकार के साथ बांटना नहीं चाहते थे। उनके इस्तीफों की भी संभवत: यही वजह रही। हालांकि, दोनों ने इस्तीफों के पीछे निजी वजह ही बताई।


अब इस पूरे फंड ट्रांसफर को समझने से पहले हमें आरबीआई की बैलेंस शीट को समझना होगा। दरअसल, आरबीआई के पास कुल 41 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति है। आरबीआई के रिजर्व के चार अहम हिस्से होते हैं। एक अहम हिस्सा कंटिन्जेंसी फंड कहलाता है, यानी वो फंड जो आपात स्थिति में काम आए। अभी तक इस फंड में 2.3 लाख करोड़ रुपए थे। आरबीआई ने इसी फंड में से 52,637 करोड़ रुपए सरकार को देने का फैसला लिया है। ऐसी स्थिति में फंड ट्रांसफर के बाद आपात स्थितियों के लिए आरबीआई के पास 1.77 लाख करोड़ रुपए ही बचेंगे। 


सरकार के लिए आगे रिजर्व बैंक से पैसा लेना आसान नहीं होगा, क्योंकि कंटिन्जेंसी फंड अब अपने न्यूनतम स्तर पर होने से रिजर्व बैंक के पास भविष्य में बहुत अधिक विकल्प नहीं होंगे। सप्ताह के इस चर्चित मुद्दे पर हम आपको वह सब कुछ बता रहे हैं जो आपको जानना जरूरी है।

 

आरबीआई के रिजर्व के ये चार हिस्से होते हैं

करंसी एंड गोल्ड रिवैल्यूएशन: आरबीआई विदेशी मुद्रा और सोने में निवेश करता रहता है। इनकी कीमतों में परिवर्तन से यह खाता प्रभावित होता है। आरबीआई अगर 60 रुपए की दर से 100 डॉलर खरीदता है तो उसकी कुल पूंजी 6000 रु. होगी। अगर यह कीमत बढ़कर 70 रु. हो जाती है तो आरबीआई के इस खाते में एक हजार रुपए आ जाएंगे। यही सोने पर भी लागू होता है। यही आरबीआई का सबसे बड़ा हिस्सा होता है और इसमें 2010 से लगातार बढ़ोतरी हो रही है। करंसी वैल्यूएशन माह के अंतिम कार्यदिवस को और सोने का वैल्यूएशन 90 दिन के औसत पर लिया जाता है। 

आरबीआई की बैलेंस शीट में इस रिजर्व के तहत 6.9 लाख करोड़ रुपए थे।

 

कंटिन्जेसीं फंड (सीएफ): आपात स्थिति में रिजर्व बैंक इस पैसे का इस्तेमाल करता है। यह रिजर्व बैंक के कुल खजाने का एक चौथाई होता है। आरबीआई लाभ का एक हिस्सा इस अकाउंट में डालता रहता है।
बैलेंस शीट में 2.3 लाख करोड़ रुपए था।

इन्वेस्टमेंट रिवैल्यूएशन अकाउंट (आईआरए): यह अकाउंट दो हिस्सों में होता है। एक में विदेशी प्रतिभूतियां हाेती हैं, जबकि दूसरे में रुपए की प्रतिभूतियां होती हैं।

एसेट डेवलपमेंट बैंक (एडीबी): यह अकाउंट अंदरूनी पूंजी खर्चों को पूरा करने और सहायक संगठनों में निवेश करने के लिए होता है। 
ये दोनों रिजर्व का छोटा हिस्सा होते हैं।  बैलेंस शीट में यह 30 हजार करोड़ रु था।

 

किस सिफारिश पर पैसा मिला?

जालान पैनल ने सिफारिश की है कि कंटिन्जेंसी फंड यानी आपात स्थिति में इस्तेमाल होने वाला पैसा आरबीआई के कुल रिजर्व का 5.5 से 6.5% तक होना चाहिए। अभी यह 6.8 % था। इसलिए पैनल ने सीएफ को 5.5 % पर रखते हुए वहां से 52,637 करोड़ सरकार को ट्रांसफर करने का फैसला किया। विमल जालान पैनल की दूसरी सिफारिश थी कि रियलाइज्ड इक्विटी व आर्थिक पूंजी आरबीआई की बैलेंस शीट का 20 से 24.5 फीसदी होना चाहिए। जून 2019 में यह 24.5 के स्तर पर था, इसलिए मौजूदा वित्तीय वर्ष की कुल आय 1,23,414 करोड़ को सीएफ में ट्रांसफर न करते हुए सरकार को दे दिया जाए।
रियलजाइज्ड इक्विटी और आर्थिक पूंजी कुल मिलाकर 1,76,051 करोड़ रुपए बनती हैं।

 

सरकार के समक्ष क्या चुनौतियां हैं

वित्तीय वर्ष 2019-20 में इनकम टैक्स में 23 फीसदी ग्रोथ का अनुमान लगाया गया था, लेकिन अप्रैल से जून के आंकड़े देखें तो डायरेक्ट टैक्स में सिर्फ 9.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जीएसटी को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। अब यह पैसा मिलने से सरकार अपने वित्तीय घाटे के लक्ष्य को काफी हद तक पूरा कर सकेगी।

 

चिंता की वजह क्या है

2012-13 तक आरबीआई अपनी कुल आय का 32 से 45 फीसदी तक हिस्सा कंटींजेंसी फंड (सीएफ) में डालता था। इससे यह उसकी कुल संपत्ति का 9 से 10% तक हो गया था। लेकिन 2013-14 से इसमें कुछ नहीं डाला जा रहा था और आरबीआई की पूरी सरप्लस राशि सरकार को मिल रही थी। 2016-17 में आरबीआई ने एक बार फिर से इसमें पैसा डालना शुरू कर दिया था।  पिछले चार साल से यह 6 से 7% के स्तर पर बना हुआ था। अब इसे 5.5 फीसदी करने से आरबीआई के सामने भविष्य में बड़े कदम उठाने के विकल्प सीमित हो गए हैं। इस साल अब तक आरबीआई की नेट आय बहुत अधिक रही है, क्योंकि बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए उसने बड़ी मात्रा में बांड खरीदे थे और उनके ब्याज से उसे भारी आय हुई है। हो सकता है अगले साल ऐसा न हो। इससे सरकार को भविष्य में फंड ट्रांसफर रुक सकता है।

 

कहां-कहांं से होती है रिजर्व बैंक की आमदनी

आरबीआई सामान्यत:
निवेश एवं ऋण पर मिलने वाले ब्याज, प्रतिभूतियों की खरीद-फरोख्त से होने वाले लाभ एवं करंसी के मुद्रण से होने वाले लाभ के रूप में आय अर्जित करता है। इस साल रिजर्व बैंक की बैलेंस शीट का साइज करीब 41 लाख करोड़ था।

 

किन स्थितियों में इस्तेमाल होता है कंटीजेंसी फंड 

जब अप्रत्याशित वित्तीय संकट, किसी बड़े साइबर फ्रॉड और ऑपरेशनल रिस्क, जिसमें प्रतिभूति एवं मुद्रा की कीमत में भारी गिरावट आ जाए एवं किसी बड़े बैंक मेें अप्रत्याशित संकट आ जाए तो इनको समर्थन देने के लिए रिजर्व बैंक इस फंड का इस्तेमाल करता है।

 

आरबीआई के इस कदम से मुझे  क्या मिलेगा

इस धन से आम आदमी को अभी सीधा कोई लाभ होगा, ऐसा नहीं दिख रहा है। लेकिन, इससे सरकार लोगों पर पड़ रहे टैक्स के बोझ को कम कर सकती है। यह कमी इनकम टैक्स दरों के सरलीकरण के रूप में सामने आ सकती है। हाल ही में इस तरह की सिफारिश सरकार द्वारा गठित टास्क फोर्स भी कर चुकी है।

सरकार कैसे खर्च करेगी इस सरप्लस  फंड को

अब सवाल यह है कि सरकार इस पैसे का इस्तेमाल करती किस तरह से है। पिछले कुछ वर्षों में जीडीपी की तुलना में सरकार का पूंजीगत खर्च का हिस्सा लगातार कम हो रहा है। इस बार सरकार को इस धन का उपभोग बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करने की बजाय उत्पादकता के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि इसका पूरी अर्थव्यवस्था पर स्थायी और गुणात्मक प्रभाव पड़े।

 

52,637 करोड़ रु. ही जाएंगे आरबीआई से

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक सरकार को ट्रांसफर होने वाली सरप्लस राशि आंकड़ों में तो 1,76,051 करोड़ रुपए है, लेकिन इस वित्तीय वर्ष में रिजर्व बैंक पर इसका कुल इम्पैक्ट 52,637 करोड़ ही आएगा। उनके मुताबिक आरबीआई सरकार को 28,000 करोड़ रुपए अंतरिम डिविडेंड के तौर पर पहले ही दे चुका है। इस तरह से अब 1,48,051 करोड़ रुपए की नेट देनदारी बची है। इस साल आरबीआई का कुल डिविडेंड 1,23,414 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। इसे कम करने के बाद सिर्फ 52,637 करोड़ रुपए ही रिजर्व बैंक सरकार को हस्तांतरित करेगा। इस तरह से देखें तो यह राशि 1.76 लाख करोड़ रुपए की तुलना में काफी कम है।

 

विवाद भी रहा है सरकार को फंड ट्रांसफर करने पर

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग द्वारा रिजर्व बैंक से सरप्लस फंड लेने की सलाह देने के बाद से पिछले कुछ सालों में सरकार और आरबीआई के बीच यह धन विवाद का विषय रहा। गर्ग जालान पेनल में भी थे, हालांकि बाद में उनकी जगह राजीव कुमार आ गए थे। अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले ही पद छोड़ने वाले रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल व उनके डिप्टी विरल आचार्य भी अपने सरप्लस को सरकार से बांटने के पक्ष में नहीं थे।

 

सरकार को अभी रिजर्व बैंक से मिले सरप्लस धन के इस्तेमाल के बारे में फैसला करना है। -निर्मला सीतारमण वित्तमंत्री

(हमारे एक्सपर्ट हैं बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व महाप्रबंधक राजीव कुमार गुप्ता।)



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