Friday, September 18, 2020
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Devshayani Ekadashi 2020 Date And Importance Of Ekadashi – Devshayani Ekadashi 2020: आखिर क्यों चार महीने पाताल लोक में जाते हैं श्री नारायण



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अनीता जैन, वास्तुविद
Updated Mon, 29 Jun 2020 07:16 AM IST

Devshayani Ekadashi 2020:गरुड़ध्वज जगन्नाथ के शयन करने पर  विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गोदान, गृहप्रवेश आदि सभी  शुभ कार्य वर्जित हैं।

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हरिशयनी एकादशी, देवशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी नाम से जानी जाने वाली एकादशी इस वर्ष 1 जुलाई है। इस दिन से चार महीने के लिए चातुर्मास नियम का प्रारंभ हो जाता हैं। देवशयनी एकादशी नाम से ही स्पष्ट है कि इस दिन श्रीहरि शयन करने चले जाते हैं, इस अवधि में श्री नारायण पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं। गरुड़ध्वज जगन्नाथ के शयन करने पर  विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गोदान, गृहप्रवेश आदि सभी  शुभ कार्य वर्जित हैं।महिमा का गान करने में ब्रह्माजी भी हैं असमर्थशास्त्रानुसार श्री नारायण ने एकादशी का महत्त्व बताते हुए कहा है कि देवताओं में श्री कृष्ण,देवियों में प्रकृति, वर्णों में ब्राह्मण तथा वैष्णवों में भगवान शिव श्रेष्ट हैं। उसी प्रकार व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। देवशयनी एकादशी की रात में जागरण करके शंख,चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने वाले के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं। देवशयनी एकादशी के चार माह के बाद भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागते हैं, लगभग चार माह के इस अंतराल को चार्तुमास कहा गया है। धार्मिक दृष्टि से ये चार महीने भगवान विष्णु के निद्राकाल माने जाते हैं।इसलिए विश्राम करते हैं नारायणशास्त्रों के अनुसार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। घबराए इंद्रदेव व अन्य सभी देवताओं ने जब भगवान विष्णु से सहायता मांगी तो श्री हरि ने वामन अवतार लिया और राजा बलि से दान मांगने पहुंच गए। वामन भगवान ने दान में तीन पग भूमि मांगी। दो पग में भगवान ने धरती और आकाश नाप लिया और तीसरा पग कहां रखे जब यह पूछा तो बलि ने कहा कि उनके सिर पर रख दें। इस तरह बलि से तीनों लोकों को मुक्त करके श्री नारायण ने देवराज इंद्र का भय दूर किया। लेकिन राजा बलि की दानशीलता और भक्ति भाव देखकर भगवान विष्णु ने बलि से वर मांगने के लिए कहा।बलि ने भगवान से कहा कि आप मेरे साथ पाताल चलें और हमेशा वहीं निवास करें। भगवान विष्णु ने अपने भक्त बलि की इच्छा पूरी की और पाताल चले गए। इससे सभी देवी-देवता और देवी लक्ष्मी चिंतित हो उठी। देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कराने लिए एक युक्ति सोची  और एक गरीब स्त्री बनकर राजा बलि के पास पहुँच गईं। इन्होंने राजा बलि को अपना भाई मानते हुए  राखी बांधी और बदले में भगवान विष्णु को पाताल से मुक्त करने का वचन मांग लिया।भगवान विष्णु अपने भक्त को निराश नहीं करना चाहते थे इसलिए बलि को वरदान दिया कि वह साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में निवास करेंगे,इसलिए इन चार महीनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।चार महीने नेत्रों में रहती है योगनिद्राब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक अन्य प्रसंग में एक बार योगनिद्रा ने बड़ी कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे प्रार्थना की भगवान आप मुझे अपने अंगों में स्थान दीजिए । लेकिंन श्री हरि ने देखा कि  उनका अपना शरीर तो लक्ष्मी के द्वारा अधिष्ठित है। इस तरह का विचार कर श्री विष्णु ने अपने नेत्रों में योगनिद्रा को स्थान दे दिया और योगनिद्रा को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम वर्ष में चार मास मेरे आश्रित रहोगी।पूजन मंत्र से कराएं शयनदेवशयनी एकादशी को श्री हरि का शयनकाल शुरू होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है। पदम् पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन कमललोचन भगवान विष्णु का कमल के फूलों से पूजन करने से तीनों लोकों के देवताओं का पूजन हो जाता है।  इस दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाकर पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाकर श्री हरि कीआरती उतारनी चाहिए। भगवान को पान-सुपारी अर्पित करने के  बाद इस मन्त्र के द्वारा स्तुति करें।      ‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।         विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।”हे जगन्नाथ जी! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सुप्त हो जाता है और आपके जाग जाने पर सम्पूर्ण विश्व तथा चराचर भी जागृत हो जाते हैं । प्रार्थना करने के बाद भगवान को श्वेत वस्त्रों की शय्या पर शयन करा देना चाहिए।

हरिशयनी एकादशी, देवशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी नाम से जानी जाने वाली एकादशी इस वर्ष 1 जुलाई है। इस दिन से चार महीने के लिए चातुर्मास नियम का प्रारंभ हो जाता हैं। देवशयनी एकादशी नाम से ही स्पष्ट है कि इस दिन श्रीहरि शयन करने चले जाते हैं, इस अवधि में श्री नारायण पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं। गरुड़ध्वज जगन्नाथ के शयन करने पर  विवाह, यज्ञोपवीत संस्कार, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गोदान, गृहप्रवेश आदि सभी  शुभ कार्य वर्जित हैं।

महिमा का गान करने में ब्रह्माजी भी हैं असमर्थ

शास्त्रानुसार श्री नारायण ने एकादशी का महत्त्व बताते हुए कहा है कि देवताओं में श्री कृष्ण,देवियों में प्रकृति, वर्णों में ब्राह्मण तथा वैष्णवों में भगवान शिव श्रेष्ट हैं। उसी प्रकार व्रतों में एकादशी व्रत श्रेष्ठ है। देवशयनी एकादशी की रात में जागरण करके शंख,चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने वाले के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं। देवशयनी एकादशी के चार माह के बाद भगवान विष्णु प्रबोधिनी एकादशी के दिन जागते हैं, लगभग चार माह के इस अंतराल को चार्तुमास कहा गया है। धार्मिक दृष्टि से ये चार महीने भगवान विष्णु के निद्राकाल माने जाते हैं।

इसलिए विश्राम करते हैं नारायण
शास्त्रों के अनुसार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। घबराए इंद्रदेव व अन्य सभी देवताओं ने जब भगवान विष्णु से सहायता मांगी तो श्री हरि ने वामन अवतार लिया और राजा बलि से दान मांगने पहुंच गए। वामन भगवान ने दान में तीन पग भूमि मांगी। दो पग में भगवान ने धरती और आकाश नाप लिया और तीसरा पग कहां रखे जब यह पूछा तो बलि ने कहा कि उनके सिर पर रख दें। इस तरह बलि से तीनों लोकों को मुक्त करके श्री नारायण ने देवराज इंद्र का भय दूर किया। लेकिन राजा बलि की दानशीलता और भक्ति भाव देखकर भगवान विष्णु ने बलि से वर मांगने के लिए कहा।बलि ने भगवान से कहा कि आप मेरे साथ पाताल चलें और हमेशा वहीं निवास करें। भगवान विष्णु ने अपने भक्त बलि की इच्छा पूरी की और पाताल चले गए। इससे सभी देवी-देवता और देवी लक्ष्मी चिंतित हो उठी। देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कराने लिए एक युक्ति सोची  और एक गरीब स्त्री बनकर राजा बलि के पास पहुँच गईं। इन्होंने राजा बलि को अपना भाई मानते हुए  राखी बांधी और बदले में भगवान विष्णु को पाताल से मुक्त करने का वचन मांग लिया।भगवान विष्णु अपने भक्त को निराश नहीं करना चाहते थे इसलिए बलि को वरदान दिया कि वह साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक पाताल लोक में निवास करेंगे,इसलिए इन चार महीनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं।चार महीने नेत्रों में रहती है योगनिद्राब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक अन्य प्रसंग में एक बार योगनिद्रा ने बड़ी कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे प्रार्थना की भगवान आप मुझे अपने अंगों में स्थान दीजिए । लेकिंन श्री हरि ने देखा कि  उनका अपना शरीर तो लक्ष्मी के द्वारा अधिष्ठित है। इस तरह का विचार कर श्री विष्णु ने अपने नेत्रों में योगनिद्रा को स्थान दे दिया और योगनिद्रा को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम वर्ष में चार मास मेरे आश्रित रहोगी।पूजन मंत्र से कराएं शयनदेवशयनी एकादशी को श्री हरि का शयनकाल शुरू होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा की जाती है। पदम् पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन कमललोचन भगवान विष्णु का कमल के फूलों से पूजन करने से तीनों लोकों के देवताओं का पूजन हो जाता है।  इस दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करवाकर पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाकर श्री हरि कीआरती उतारनी चाहिए। भगवान को पान-सुपारी अर्पित करने के  बाद इस मन्त्र के द्वारा स्तुति करें।      ‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।         विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।”हे जगन्नाथ जी! आपके सो जाने पर यह सारा जगत सुप्त हो जाता है और आपके जाग जाने पर सम्पूर्ण विश्व तथा चराचर भी जागृत हो जाते हैं । प्रार्थना करने के बाद भगवान को श्वेत वस्त्रों की शय्या पर शयन करा देना चाहिए।



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