Monday, October 19, 2020
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DU शिक्षकों की कुलपति से अपील, ‘एकेडमिक डिबेट की परंपरा को दोबारा स्थापित करें’

(इरम आगा)

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षकों ने मंगलवार को डीयू के कुलपति से अपील की कि वो शैक्षिक बहस की परंपरा को दोबारा से स्थापित करें और साथ ही पाठ्यक्रम से कुछ चुनिंदा विचारधारा से जुड़ी किताबों को निशाना बनाने से रोकें. दरअसल हाल ही में इतिहास विभाग की रीडिंग लिस्ट से ऐसे दो पाठ्यक्रम की किताबों को हटाने के विचार पर बवाल मचा जिसमें नक्सल मूवमेंट से सहानुभूति जताई गई है.

काउंसिल के कुछ सदस्यों की ओर से आपत्ति जताने के बाद प्रोफेसर नंदिनी सुंदर की ‘सुबाल्टर्न्स एंड सोवर्रेंस: एन एन्थ्रोपोलोजिकल हिस्ट्री ऑफ बस्तर’, 1854-2006 (2007) और प्रोफेसर अर्चना प्रसाद की ‘अगेन्स्ट इकोलॉजिकल रोमांटिसिसम: वैरियर एल्विन एंड द मेकिंग ऑफ एन एंटी-मॉर्डन ट्राइबल आईडेंटिटी (2003)’ को रीडिंग लिस्ट से हटाने पर विचार किया जा रहा है.

अगस्त में एकेडमिक काउंसिल की बैठक हुई थी जिसमें च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम के तहत पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रम के संशोधन पर चर्चा हुई. इतिहास विभाग की ओर से उद्घृत एक ख़ास पेपर ‘ट्राइबल, कास्ट एंड एक्सक्लूजन’ की रीडिंग लिस्ट में इन दो किताबों का ज़िक्र था. तब से विश्वविद्यालय में इस बात पर बहस छिड़ी थी कि एकेडमिक डिबेट्स में असहमति के स्वर को ज़िन्दा रखा जाए.न्यूज़ 18 से बात करते हुए डीयू की प्रोफेसर गीता भट्ट ने कहा, ‘कोई इस बात को लेकर बहस नहीं कर रहा है कि अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े कामों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए. लेकिन इनमें से कुछ ऐसी बातें हैं जो नक्सल मूवमेंट का महिमामंडन करते हैं. प्रसाद की लिखी एक किताब है जिसमें आदिवासियों के धर्मपरिवर्तन को जायज़ बताया गया है. किताब में कहा गया है कि इन लोगों की ज़िन्दगियों में सुख-सुविधा, रोज़गार, खाद्य पदार्थ जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. ऐसी किताबों की कहानियों को डाटा और रिसर्च का नाम दिया जाता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘ये किताबें प्रतिबंधित नहीं हैं. जिन्हें पढ़ना है वो जाकर उन्हें पढ़ सकते हैं. लेकिन हमें इन किताबों को विश्वविद्यालय में पढ़ाने की क्या ज़रूरत है? ऐसी जगहों पर युवा छात्र जो उस उम्र के पढ़ाव पर हैं जहां उनके मन पर आसानी से छाप छोड़ा जा सकता है, ये किताबें उनके मन में नक्सल मूवमेंट के प्रति सहानुभूति पैदा करता है.’

इससे पहले 2017 में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने प्रस्ताव रखा कि सुंदर की किताब, ‘द बर्निंग फॉरेस्ट: इंडियाज़ वॉर इन बस्तर’ के कुछ चैप्टरों को एमए के लिए समाज शास्त्र के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए. उन्होंने पाया कि उसका शीर्षक, ‘भारत के खिलाफ युद्ध का प्रचार करने जैसा है.’

भट्ट इस बात को लेकर आशावान हैं कि जैसे पहले वाले को समाज शास्त्र के पाठ्यक्रम से हटाने में सफलता मिली थी, उसको लेकर भी विरोध तब तक चलेगा जब तक कि ये पाठ्यक्रम से हटाया ना जाए.

कुलपति को लिखे चिट्ठी में एकेडमिक काउंसिल के सभी सदस्यों ने इसे एक घातक ट्रेंड बताया जो बढ़ियां जानकारी से परिपूर्ण डीबेट्स को ख़त्म करना चाहता है. इस चिट्ठी में इंदिरा चंद्रशेखर, देव कुमार, ज्योति सभरवाल, सचिन एन, सैकत घोष, शशि शेखर प्रसाद सिंह, वीएस दीक्षित के दस्तखत हैं.



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