Dainik Bhaskar

Feb 03, 2019, 02:08 PM IST

हेल्थ डेस्क. मुंबई अपनी ऊंची-ऊंची इमारतों और इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के अलावा वड़ा पाव के लिए भी जाना जाता है। अगर कोई मुंबई गया और वहां का वड़ा पाव नहीं खाया तो कहा जाता है कि मुंबई जाना व्यर्थ हो गया। हालांकि अब मुंबई का यह वड़ा-पाव सभी जगहों पर मिलता है। यह आखिर मुंबई का हिस्सा कैसे बन गया, इसकी दिलचस्प कहानी सुना रहे हैं शेफ हरपाल सिंह सोखी। 

53 साल पुराना है इतिहास

 

वड़ा पाव का इतिहास कोई बहुत पुराना नहीं है, बस करीब 53 साल पुराना। इसका श्रेय मुंबई के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले अशोक वैद्य को जाता है। 1966 में जब मुंबई में शिवसेना ने अपने पैर पसारने शुरू किए तो अशोक वैद्य भी उसके कार्यकर्ता बन गए। शिवसेना के संस्थापक और तत्कालीन प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने सभी कार्यकर्ताओं को आंत्रप्रेन्योर बनने की समझाइश दी। ठाकरे का मानना था कि कार्यकर्ता फालतू नहीं बैठें और छोटा-मोटा काम धंधा जरूर करें ताकि उनके परिवार भी चलते रहे और पार्टी भी। इसी से प्रेरित होकर वैद्य ने दादर रेलवे स्टेशन के बाहर बटाटा वड़ा (आलू वड़ा) का स्टॉल शुरू कर दिया। 

वडा और पाव का एक्सपेरिमेंट 


वैद्य बटाटा वड़ा बेचकर अपनी आजीविका कमाने लगे। इस दौरान एक दिन उन्हें एक प्रयोग करने की सूझी। उन्होंने अपने ही स्टॉल के पास ऑमलेट बेचने वाले एक वेंडर से कुछ पाव लिए और उन्हें बीच में से चाकू से काट दिए। फिर पाव के बीच में बटाटा वड़े रख दिए। इसे उन्होंने महाराष्ट्र की पारंपरिक लाल मिर्च-लहसुन की सूखी-तीखी चटनी और हरी मिर्च के साथ लोगों को खिलाना शुरू कर दिया। महाराष्ट्रीयन तीखा खाना पसंद करते हैं। तो लोगों को उनका यह प्रयोग काफी पसंद आया। देखते ही देखते ही अशोक वैद्य का वड़ा पाव लोकप्रिय होने लगा। कहा जाता है कि उस समय शिवसेना की बैठकों में कार्यकर्ताओं को वड़ा पाव ही खिलाया जाता था। कुछ ही सालों में कई अन्य लोगों ने भी वड़ा पाव बेचना शुरू कर दिया। 1998 में अशोक वैद्य के निधन के बाद उनके बेटे नरेंद्र ने उनकी इस विरासत को संभाला। दादर रेलवे स्टेशन से चला वड़ा पाव अब न केवल महाराष्ट्र में, बल्कि पूरे भारत में अपने पैर पसार चुका है। 

70 के दशक में एक वड़ा पाव केवल 20 पैसे का मिलता था। आज भी यह डिश भारत की सस्ती डिशों में शामिल है। कुछ साल पहले वड़ा पाव पर पांच मिनट की ‘वड़ा पाव इंक’ नाम से एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई गई थी, जिसे मुंबई फिल्म फेस्टिवल की डाइमेंशन्स मुंबई कैटेगरी के लिए चुना गया था। 

कैसे बनी पाव भाजी

वड़ा पाव की तरह पाव भाजी भी मुंबई की ही देन है। माना जाता है कि ब्रिटिश काल में जब मुंबई में कॉटन मिलें गुलजार हुआ करती थीं, उस समय पाव भाजी का ईजाद हुआ। उस दौरान कपास के भावों की जानकारी देर रात को टेलीग्राम के जरिए मिला करती थी। ऐसे में कपास के व्यापारियों और मजदूरों को देर रात तक मिलों में रुकना पड़ता था। लेकिन उस समय रात को खाना बड़ी मुश्किल से मिलता था। उसी दौरान खाना बेचने वाले एक स्थानीय वेंडर के दिमाग में एक आइडिया आया। दिन में अपने रेगुलर खाने से जो भी सामग्री जैसे आलू, टमाटर, प्याज और अन्य सब्जियां बच जातीं, उन्हें मिक्स कर उसकी ‘भाजी’ बना देता और उसे रोटियों या चावल के साथ बेच देता। जब किसी-किसी दिन रोटियां या चावल नहीं बचते, तो वह भाजी को पाव के साथ परोस देता। जल्दी ही भाजी के साथ पाव का कॉम्बिनेशन लोगों की जुबान पर चढ़ता गया। धीरे-धीरे यह डिश आज की ‘पाव भाजी’ के तौर पर विकसित हो गई। आज यह हर जगह बड़े ही चाव से खाई जाती है।



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