Dainik Bhaskar

Dec 01, 2019, 04:45 PM IST

हेल्थ डेस्क. पथरी या स्टोन स्वास्थ्य की एक बहुत ही प्रचलित समस्या है, जिससे अमूनन हर दूसरे-तीसरे परिवार में कोई न कोई पीड़ित रहता ही है। लेकिन पथरी-पथरी के बीच में अंतर समझना भी जरूरी है। पथरी दो तरह की होती हैं – किडनी की पथरी और गालब्लैडर (पित्त की थैली या पित्ताशय) की पथरी। इन दोनों का इलाज भी अलग-अलग होता है। किडनी की पथरी का इलाज स्टोन के आकार और उसकी लोकेशन पर निर्भर करता है जिसका सही निर्णय यूरो सर्जन मरीज की जांच और रिपोर्टों के आधार पर करते हैं। वैसे किडनी की छोटी पथरियां ज्यादा मात्रा में पानी पीने से शरीर से निकल जाती हैं। लेकिन गालब्लैडर की पथरी का उपचार ऑपरेशन ही होता है, जिसमें मरीज के गालब्लैडर को स्टोन सहित निकाल दिया जाता है। डॉ. विशाल जैन लेप्रोस्कोपिक सर्जन एवं हर्निया स्पेशलिस्ट से जानिए गालब्लैडर स्टोन के बारे में…

क्या होता है गालब्लैडर व गालस्टोन्स?

  1. हमारे शरीर में नाशपाती के आकार का थैलीनुमा यह अंग लिवर के नीचे पाया जाता है। सामान्यतः
    इसका कार्य पित्त को स्टोर करना और इसे गाढ़ा करना होता है। आम धारणा के विपरीत यह अंग स्वयं पित्त नहीं बनाता है। पित्त एक पाचक रस होता है जो लिवर द्वारा बनाया जाता है। वसायुक्त पदार्थों के पाचन के लिए यह बहुत ही जरूरी होता है। पित्ताशय की पथरियां यानी गालस्टोन्स एक सेलेकर सैकड़ों की संख्या में हो सकते हैं। ये अलग-अलग आकार-प्रकार में पाए जाते हैं।

  2. गालस्टोन्स बनने की वजह?

    इसका मूल कारण तो ज्ञात नहीं है, लेकिन नीचे दिए गए कुछ कारक गालस्टोन्स बनने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं :

    • अगर आपका वजन ज्यादा है तो आपमें गालस्टोन्स बनने की आशंका दुबले लोगों की तुलना में ज्यादा होगी।
    • अगर आप डायबिटीज के मरीज हैं तो आपमें गालस्टोन्स बनने की आशंका ज्यादा होगी।।
    • अगर आप तेजी से वजन घटाने की कोशिश कर रहे हैं यानी क्रैश डाइटिंग कर रहे हैं तो गालस्टोन्स बन सकते हैं। इसलिए वजन को कम जरूर करें, लेकिन एक संतुलित प्रक्रिया के जरिए ही।
    • अगर आप ज्यादा देर तक भूखे रहते हैं, ज्यादा उपवास करते हैं, समय पर भोजन नहीं करते हैं तो आपमें गालस्टोन्स बनने की आशंका रहेगी।
    • 30 से 40 वर्ष के दौरान गालस्टोन्स बनने की आशंका सबसे ज्यादा होती है। वैसे यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है।
    • पुरुषों की तुलना में महिलाओं में गालस्टोन्स बनने की आशंका दोगुनी होती है।
  3. क्या हैं लक्षण? 

    • 80 से 85 फीसदी मरीजों में साइलेंट गालस्टोन्स होते हैं अर्थात इसमें कोई कष्ट नहीं होता है।
    • कुछ मरीजों में पेट दर्द होता है जो पेट के दाएं ऊपरी भाग में होता है जिसे ‘कोलीक’ या ‘गाल स्टोन अटैक’ भी कहते हैं। यह दर्द पीठ में या दाएं कंधे की तरफ भी हो सकता है। यह दर्द कुछ मिनटों से लेकर कई घंटों तक बना रह सकता है और सामान्य से लेकर अत्यंत पीड़ादायक भी हो सकता है।
    • ज्यादा गैस बनना, पेट फूलना या पेट में लगातार भारीपन रहना। अपच होना विशेषकर वसायुक्त व मिर्ची मसाले वाले पदार्थों का सेवन करने पर।
    • कई बार इसकी वजह से पीलिया भी हो जाता है। यानी पीलिया भी गालस्टोन का एक संकेत हो सकता है।
  4. क्या है इलाज?

    गालस्टोन होने पर गालब्लैडर सड़ सकता है, फूट सकता है या कभी-कभार गालब्लैडर का कैंसर भी हो सकता है। इसलिए उपरोक्त कोई भी लक्षण नजर आने पर तुरंत सर्जन या लेप्रोस्कोपिक सर्जन से संपर्क करें और उनकी सलाह अनुसार इलाज करवाएं। पेट दर्द और सूजन आने पर शुरुआत में एंटीबायोटिक्स और दर्द की दवाइयां दी जाती हैं, परंतु इस समस्या का स्थाई समाधान ऑपरेशन ही है। किसी भी प्रकार की जड़ी-बूटियां गालस्टोन्स को गला नहीं सकतीं। कुछ स्वयंसिद्ध लोग आटे, कुछ नींबू से, कुछ तलवार से और कुछ कान से पथरी निकालने का ढोंग करते हैं और मरीजों को गुमराह करते हैं। इससे कई बार मरीज की स्थिति गंभीर भी हो जाती है।

  5. पथरी बनने से गालब्लैडर में सूजन आ जाती है

    जिससे यह खराब होकर शरीर के लिए अनुपयोगी हो जाता है। अतः ऑपरेशन में पथरी के साथ गालब्लैडर भी निकाल दिया जाता है, जिससे यह समस्या भविष्य में दोबारा कभी नहीं होती। खराब गालब्लैडर शरीर से निकलने पर कोई परेशानी नहीं होती। गालब्लैडर न होने पर पित्त लिवर द्वारा सीधे आंतों में चला जाता है और पाचन सुचारू रूप से होने लगता है।

  6. कितने तरह के ऑपरेशन?

    ऑपरेशन दो पद्धतियों द्वारा किया जाता है। पहली पारंपरिक विधि जिसमें चीरा लगाकर ऑपरेशन किया जाता है। दूसरी विधि है लेप्रोस्कोपिक कोलीसिसटेक्टमी जिसे बोलचाल की भाषा में दूरबीन पद्धति भी कहते हैं। दूरबीन पद्धति द्वारा ऑपरेशन करने पर मरीजों की छुट्टी एक दिन में कर दी जाती है। मरीज जल्दी ही अपना सामान्य जीवन शुरू कर सकते हैं। ऑपरेशन करवाने का सही समय सर्जन सलाहानुसार वह होता है जब आपको कोई ज्यादा तकलीफ या जटिलताएं न हों। इसमें मरीज की रिकवरी शीघ्र होती है।



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