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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू वर्ष की प्रथम तिथि है। यह तिथि धार्मिक रूप से बेहद ही महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इस साल 25 मार्च को यह तिथि पड़ रही है। यानि 25 मार्च से हिन्दू नववर्ष 2077 प्रारंभ हो रहा है। हिन्दू नववर्ष को विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं इस तिथि का धार्मिक रूप से कितना बड़ा महत्व होगा।वैदिक पंचांग की दृष्टि से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्ववैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रति वर्ष की पहली तिथि है। इसी दिन से हिन्दू मान्यता के अनुसार नए साल की शुरुआत होती है। हिन्दू वर्ष में 12 महीने (चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन) होते हैं। हिन्दू पंचांग सार्वभौमिक और वैज्ञानिक कैलेंडर है। यह सौर्य और चंद्रमा की गणना पर आधारित है। इसलिए इसकी गणना बेहद ही सटीक होती है। हिंदू पंचांग के आधार पर यह हजारों साल पहले बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय पर सूर्यग्रहण होगा। विक्रम संवत का धार्मिक महत्ववैदिक शास्त्रों और पुराणों के अनुसार सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा जी ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को इस संसार को रचा था, इसलिए इस पावन तिथि को ‘नव संवत्सर’ पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। नवरात्रि व्रत भी इसी तिथि से प्रारंभ होता है। नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है, जिसमें नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों (मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी, मां सिद्धिदात्री) की पूजा अर्चना की जाती है। मां के भक्त नवरात्रि के व्रत रखकर उनकी उपासना करते हैं। विक्रम संवत 2077 का राजा होगा सूर्य चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस वार से विक्रमी संवत शुरू होता है, वही इस संवत का राजा होता है। सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है, तो वह संवत का मंत्री होता है। विक्रम संवत समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ माना जाता है। समस्त शुभ कार्य इसी पंचांग की तिथि से ही किए जाते हैं। यहां तक की वित्तीय वर्ष भी हिन्दू नववर्ष से प्रारंभ होता है और समाप्त भी इसी के साथ होता है।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू वर्ष की प्रथम तिथि है। यह तिथि धार्मिक रूप से बेहद ही महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इस साल 25 मार्च को यह तिथि पड़ रही है। यानि 25 मार्च से हिन्दू नववर्ष 2077 प्रारंभ हो रहा है। हिन्दू नववर्ष को विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं इस तिथि का धार्मिक रूप से कितना बड़ा महत्व होगा।

वैदिक पंचांग की दृष्टि से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का महत्व
वैदिक पंचांग के अनुसार, चैत्र शुक्ल प्रति वर्ष की पहली तिथि है। इसी दिन से हिन्दू मान्यता के अनुसार नए साल की शुरुआत होती है। हिन्दू वर्ष में 12 महीने (चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन) होते हैं। हिन्दू पंचांग सार्वभौमिक और वैज्ञानिक कैलेंडर है। यह सौर्य और चंद्रमा की गणना पर आधारित है। इसलिए इसकी गणना बेहद ही सटीक होती है। हिंदू पंचांग के आधार पर यह हजारों साल पहले बता दिया था कि अमुक दिन, अमुक समय पर सूर्यग्रहण होगा। विक्रम संवत का धार्मिक महत्ववैदिक शास्त्रों और पुराणों के अनुसार सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा जी ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को इस संसार को रचा था, इसलिए इस पावन तिथि को ‘नव संवत्सर’ पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। नवरात्रि व्रत भी इसी तिथि से प्रारंभ होता है। नवरात्रि शक्ति की उपासना का पर्व है, जिसमें नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों (मां शैलपुत्री, मां ब्रह्मचारिणी, मां चंद्रघंटा, मां कुष्मांडा, मां स्कंदमाता, मां कात्यायनी, मां कालरात्रि, मां महागौरी, मां सिद्धिदात्री) की पूजा अर्चना की जाती है। मां के भक्त नवरात्रि के व्रत रखकर उनकी उपासना करते हैं। विक्रम संवत 2077 का राजा होगा सूर्य चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के जिस वार से विक्रमी संवत शुरू होता है, वही इस संवत का राजा होता है। सूर्य जब मेष राशि में प्रवेश करता है, तो वह संवत का मंत्री होता है। विक्रम संवत समस्त संस्कारों, पर्वों एवं त्योहारों की रीढ़ माना जाता है। समस्त शुभ कार्य इसी पंचांग की तिथि से ही किए जाते हैं। यहां तक की वित्तीय वर्ष भी हिन्दू नववर्ष से प्रारंभ होता है और समाप्त भी इसी के साथ होता है।



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