Publish Date:Fri, 14 Feb 2020 07:00 AM (IST)

Kalashtami 2020: फाल्गुन मास की काल अष्टमी 15 फरवरी 2020 दिन शनिवार को है। हिन्दू कैलेंडर के प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को काल अष्टमी होती है। इस दिन भगवान शिव के अवतार काल भैरव की पूजा की जाती है। साथ ही मां दुर्गा की भी आराधना होती है। भगवान शिव ने काल भैरव की अवतार क्यों लिया? इसके संदर्भ में दो कथाएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक कथा ब्रह्मा जी और दूसरी कथा सती से जुड़ी है। ब्रह्मा जी से जुड़ी कथा संभवत: आपको पता न हो, जबकि सती की ​कथा हम सब ने सुन रखी है।
भगवान शिव के काल भैरव अवतार की पहली कथा
शिव महापुराण के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी से पूछा कि इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ रचनाकार कौन है। इसके जवाब में ब्रह्मा जी ने स्वयं का नाम लिया। इस दौरान ब्रह्मा जी की वाणी अहंकार युक्त थी, जिससे विष्णु जी क्रोधित हो गए। तब वे दोनों अपने प्रश्न का उत्तर जानने के लिए क्रमश: चारों वेदों के पास गए। सभी ने उनको बताया कि भगवान शिव ही सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार हैं।

चारों वेदों के उत्तर सुनकर ब्रह्मा और विष्णु जी जोर-जोर से हंसने लगे। इस दौरान ब्रह्मा जी का अहंकार और बढ़ गया। तभी वहां भगवान शिव दिव्य ज्योति स्वरूप प्रकट हुए। भगवान शिव को देखकर ब्रह्मा जी अत्यंत क्रोधित हो उठे, उनका पांचवां सिर क्रोध से तप रहा था। तब भगवान शिव काल स्वरूप में प्रकट हुए, जो काल भैरव के नाम से प्रसिद्ध हुए। काल भैरव ने ब्रह्मा जी के पांचवे सिर को धड़ से अलग कर दिया।

ब्रह्म हत्या से मुक्ति के लिए भगवान शिव ने भैरव को सभी तीर्थों के दर्शन करने को कहा। तब काल भैरव ने अपने एक हाथ में ब्रह्मा जी का कटा हुआ सिर लेकर बारी-बारी से सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन किए और सभी नदियों में स्नान किया। फिर भी उनको ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति नहीं मिली। अंत में वे काशी पहुंचे, वहां जाते ही उनको ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। उनके हाथ से ब्रह्मा जी का पांचवां सिर जमीन पर गिर पड़ा। उस जगह को कपाल मोचन तीर्थ कहा जाता है।

इसके बाद से काल भैरव काशी में ही सदा के लिए बस गए। ऐसी मान्यता है कि तब से काल भैरव काशी में ही स्थायी रूप से निवास करते हैं।
भगवान शिव के काल भैरव अवतार की दूसरी कथा
य​ह कथा काफी प्रचलित है। राजा दक्ष की पुत्री सती ने अपने पिता के इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह कर लिया। इससे राजा दक्ष काफी क्रोधित हो गए। उन्होंने भगवान शिव के अपमान के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें पुत्री सती और जमाता भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया।

जब इस बात का पता सती को चला तो वे भगवान शिव से उस यज्ञ में चलने का आग्रह किया, लेकिन भगवान शिव ने उनको काफी समझाया कि बिना निमंत्रण वहां जाना उचित नहीं है। लेकिन सती नहीं मानीं। वे यज्ञ में पहुंच गईं, जहां पर राजा दक्ष ने उनके पति महादेव का अपमान किया। इससे आहत होकर उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहूति दे दी। त्रिकालदर्शी भगवान शिव ये देखकर अत्यंत क्रोधित हो गए। तब उन्होंने अपने भैरव अवतार की रचना की, जिन्होंने यज्ञ स्थल पर जाकर राजा दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया।

उधर भगवान शिव भी यज्ञ स्थल पहुंच गए और सती के पार्थिक शरीर को कंधे पर लेकर पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने लगे। ऐसे में भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। उनके शरीर के अंग धरती पर जहां-जहां गिरे, वहां-वहां पर माता के शक्तिपीठ बने हैं। ऐसी मान्यता है कि काल भैरव अवतार में भगवान शिव उन शक्ति पीठों की आज भी रक्षा करते हैं।
Posted By: Kartikey Tiwari

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