सूर्यदेव 15 जनवरी की प्रातः ब्रह्मवेला में 04 बजकर 05 मिनट पर दक्षिणायन की यात्रा समाप्त कर उत्तरायण की राशि ‘मकर’ में प्रवेश करने वाले हैं। इसी के साथ ही देवताओं के दिन और पितरों की रात्रि का शुभारंभ हो जाएगा, जिसके फलस्वरूप सभी तरह के मांगलिक कार्य, यज्ञोपवीत, शादी-विवाह, गृहप्रवेश आदि आरम्भ हो जायेंगे। सूर्य का मकर राशि प्रवेश पृथ्वी वासियों के लिए वरदान की तरह है, क्योंकि सृष्टि के सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर आदि इनके मकर राशि के गोचर के मध्य ‘तीर्थराज प्रयाग’ में एकत्रित होकर गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम तट पर स्नान, जप-तप, और दान-पुण्य कर अपना जीवन धन्य करते हैं। 

शास्त्र कहते हैं कि, यहाँ की एक माह की तपस्या पर लोक में एक कल्प तक निवास का अवसर देती है इसीलिए यहाँ भक्तजन कल्पवास भी करते हैं।श्री तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है कि, माघ मकर रबिगत जब होई। तीरथपति आवहिं सब कोई।| देव दनुज किन्नर नर श्रेंणी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेंणी।|एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज-निज आश्रम जाहीं।| अर्थात- माघ माह में मकर संक्रांति के पुण्य अवसर पर सभी तीर्थों के राजा प्रयाग के पावन संगम तट पर मासपर्यंत वास करते हुए स्नान-ध्यान तपादि करते हैं। वैसे तो प्राणी इस माह में किसी भी तीर्थ, नदी और समुद्र में स्नान कर दान-पुण्य करके त्रिबिध तापों से मुक्ति पा सकता है किन्तु, प्रयागतीर्थ के मध्य दैवसंगम का फल सभी कष्टों से मुक्ति दिलाकर मोक्ष देने में सक्षम है। यहाँ का एक माह का कल्पवास करने से जीवात्मा एक कल्प तक जीवन-मरण के बंधन से मुक्त रहता है।

इस माह अपने पितरों को अर्घ्य देने और श्राद्ध-तर्पण आदि करने से पितृश्राप से भी मुक्ति मिल जाती है। ‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार प्रयाग तीर्थ में आठ हज़ार श्रेष्ट धनुर्र्धारी हर समय माँ गंगा की रक्षा करते हैं। सूर्यदेव अपनी प्रियपुत्री यमुना की रक्षा करते हैं। 

देवराज इंद्र प्रयागतीर्थ की रक्षा, शिव अक्षय वट की और विष्णु मंडल की रक्षा करते हैं। इस अवधि में लौकिक-पारलौकिक शक्तियां पृथ्वी पर एकत्रित होकर संगम तट पर अनेकानेक रूपों में वास करती हैं परिणाम स्वरुप यहाँ जल का स्तर बढ़ जाता है। यह अद्भुत संयोग जीवात्माओं को अपने किये गए शुभ-अशुभ कर्मों का प्रायश्चित करने का सुअवसर देता है। 

सूर्य के सहयोग से ही ब्रह्मा जी सृष्टि का सृजन करते हैं, ‘सूर्य रश्मितो जीवोऽभि जायते’ अर्थात सूर्य की किरणों से ही जीव की उतपत्ति होती है। कर्मविपाक संहिता में भी कहा गया है कि, ब्रह्मा विष्णुः शिवः शक्तिः देव देवो मुनीश्वरा, ध्यायन्ति भास्करं देवं शाक्षीभूतं जगत्त्रये। अर्थात- ब्रह्मा, विष्णु, शिव, शक्ति, देवता, योगी ऋषि-मुनि आदि तीनों लोकों के शाक्षी भूत भगवान् सूर्य का ही ध्यान करते हैं। सूर्यदेव ऐसे देवता हैं जो केवल जल अर्घ्य देने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। जीवात्मा की जन्मकुंडली में भी सूर्य की स्थिति का गंभीरता से विचार किया जाता है क्योंकि, अकेले सूर्य ही बलवान हों तो सात ग्रहों का दोष शमन कर देते हैं, ‘सप्त दोषं रबिर्र हन्ति शेषादि उत्तरायणे’ उत्तरायण हों तो आठ ग्रहों का दोष शमन कर देते हैं। शास्त्र भी प्राणियों को भगवान् सूर्य को जल का अर्घ्य देने की सलाह देते हैं।

जो मनुष्य प्रातःकाल स्नान करके सूर्य को अर्घ्य देता है उसे किसी भी प्रकार का ग्रहदोष नहीं लगता क्योंकि इनकी सहस्रों किरणों में से प्रमुख सातों किरणें सुषुम्णा, हरिकेश, विश्वकर्मा, सूर्य, रश्मि, विष्णु और सर्वबंधु, जिनका रंग बैगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल है हमारे शरीर को नयी उर्जा और आत्मबल प्रदान करते हुए हमारे पापों का शमन कर देती हैं प्रातःकालीन लाल सूर्य का दर्शन करते हुए ‘ॐ सूर्यदेव महाभाग ! त्र्यलोक्य तिमिरापः। मम् पूर्वकृतं पापं क्षम्यतां परमेश्वरः’। यह मंत्र बोलते हुए सूर्य नमस्कार करने से जीव को पूर्वजन्म में किये हुए पापों से मुक्ति मिलती है।





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